पिछले श्लोक में कृष्ण, अर्जुन और भीम के शंखों का नाम आया। अब शेष तीन पाण्डवों की बारी है। कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्तविजय शंख बजाया। नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक शंख बजाया।
प्रत्येक शंख का नाम सार्थक है। "अनन्तविजय" — अर्थात अनन्त विजय। युधिष्ठिर धर्मराज थे, और धर्म की विजय कभी समाप्त नहीं होती — इसलिए उनके शंख का यह नाम बिलकुल सटीक है। "सुघोष" — मधुर ध्वनि वाला, और "मणिपुष्पक" — मणियों और पुष्पों से सुसज्जित।
पाँचों पाण्डवों ने अपने-अपने शंख बजाए — यह एकता का प्रतीक है। पाँच भाई, पाँच शंख, एक ही दिशा में बज रहे हैं। जब परिवार एकजुट होकर खड़ा होता है, तो उसकी शक्ति अपार होती है। यही पाण्डवों की सबसे बड़ी ताकत थी — उनकी आपसी एकता।