📿 श्लोक संग्रह

अनन्तविजयं राजा

गीता 1.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥
अनन्तविजयम्
अनन्तविजय (युधिष्ठिर का शंख)
राजा
राजा
कुन्तीपुत्रः
कुन्ती के पुत्र
युधिष्ठिरः
युधिष्ठिर
नकुलः
नकुल
सहदेवः
सहदेव
सुघोषम्
सुघोष (नकुल का शंख)
मणिपुष्पकौ
मणिपुष्पक (सहदेव का शंख)

पिछले श्लोक में कृष्ण, अर्जुन और भीम के शंखों का नाम आया। अब शेष तीन पाण्डवों की बारी है। कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्तविजय शंख बजाया। नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक शंख बजाया।

प्रत्येक शंख का नाम सार्थक है। "अनन्तविजय" — अर्थात अनन्त विजय। युधिष्ठिर धर्मराज थे, और धर्म की विजय कभी समाप्त नहीं होती — इसलिए उनके शंख का यह नाम बिलकुल सटीक है। "सुघोष" — मधुर ध्वनि वाला, और "मणिपुष्पक" — मणियों और पुष्पों से सुसज्जित।

पाँचों पाण्डवों ने अपने-अपने शंख बजाए — यह एकता का प्रतीक है। पाँच भाई, पाँच शंख, एक ही दिशा में बज रहे हैं। जब परिवार एकजुट होकर खड़ा होता है, तो उसकी शक्ति अपार होती है। यही पाण्डवों की सबसे बड़ी ताकत थी — उनकी आपसी एकता।

युधिष्ठिर को "राजा" कहा गया है — यह सम्बोधन महत्वपूर्ण है क्योंकि वही पाण्डवों के वास्तविक राजा हैं। कौरवों ने उनका राज्य छीन लिया, लेकिन गीता उन्हें "राजा" ही कहती है — धर्म का राजा।

इस श्लोक के साथ पाँचों पाण्डवों के शंखनाद का वर्णन पूरा होता है। आगे के श्लोकों में और भी पाण्डव-पक्ष के योद्धाओं के शंख बजने का वर्णन है, और फिर अर्जुन कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने का अनुरोध करता है।

अध्याय 1 · 16 / 47
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