📿 श्लोक संग्रह

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते

गीता 1.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥
ततः
उसके बाद
श्वेतैः
श्वेत (सफ़ेद)
हयैः
घोड़ों से
युक्ते
जुते हुए
महति
विशाल
स्यन्दने
रथ पर
स्थितौ
विराजमान
माधवः
श्रीकृष्ण
पाण्डवः
अर्जुन
दिव्यौ
दिव्य (अलौकिक)
शङ्खौ
दो शंख
प्रदध्मतुः
बजाए

कौरव पक्ष के शंखनाद के उत्तर में पाण्डव पक्ष से भी शंखध्वनि हुई। सफ़ेद घोड़ों से जुड़े विशाल रथ पर श्रीकृष्ण (माधव) और अर्जुन (पाण्डव) विराजमान थे। दोनों ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाए।

यह दृश्य बहुत भव्य है — श्वेत अश्वों से सजा विशाल रथ, उस पर स्वयं भगवान कृष्ण सारथी के रूप में और महान धनुर्धर अर्जुन योद्धा के रूप में। "दिव्यौ शङ्खौ" — दोनों के शंख साधारण नहीं थे, अलौकिक थे। कृष्ण का शंख पाञ्चजन्य और अर्जुन का शंख देवदत्त — दोनों के नाम अगले श्लोक में आते हैं।

ध्यान दीजिए कि कौरव पक्ष के वर्णन में "तुमुल" (भयंकर कोलाहल) शब्द आया था, लेकिन कृष्ण-अर्जुन के शंख को "दिव्य" कहा गया। यह अन्तर महत्वपूर्ण है — एक पक्ष में कोलाहल है, दूसरे में दिव्यता।

यह श्लोक पाण्डव पक्ष के शंखनाद का आरम्भ है। "माधव" — कृष्ण का यह नाम लक्ष्मीपति होने के कारण है। वे स्वयं शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा के बावजूद सारथी बनकर अर्जुन के साथ हैं — यही गीता की पृष्ठभूमि है।

श्वेत अश्व शुद्धता और सत्य का प्रतीक माने जाते हैं। पाण्डव पक्ष का रथ श्वेत अश्वों से सजा है — यह धर्म-पक्ष का सूक्ष्म संकेत है।

अध्याय 1 · 14 / 47
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