📿 श्लोक संग्रह

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च

गीता 1.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥
ततः
उसके बाद
शङ्खाः
शंख
भेर्यः
नगाड़े
पणवानकगोमुखाः
ढोल, मृदंग और तुरहियाँ
सहसा
एक साथ
एव
ही
अभ्यहन्यन्त
बजाए गए
सः
वह
शब्दः
ध्वनि
तुमुलः
भयंकर (कोलाहलपूर्ण)
अभवत्
हुई

भीष्म पितामह के शंख बजाते ही कौरव सेना में एक साथ सैकड़ों वाद्य बज उठे — शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और तुरहियाँ। उनकी सम्मिलित ध्वनि इतनी भयंकर थी कि पूरा कुरुक्षेत्र गूँज उठा।

कल्पना कीजिए उस दृश्य की — विशाल मैदान में लाखों सैनिक खड़े हैं, और अचानक सैकड़ों वाद्ययंत्र एक साथ बज उठते हैं। वह ध्वनि आकाश को चीर देने वाली रही होगी। यह शब्द "तुमुल" — अर्थात भयानक कोलाहल — से वर्णित किया गया है।

प्राचीन काल में युद्ध के पहले वाद्य बजाने की परम्परा थी। इससे सैनिकों का मनोबल बढ़ता था और शत्रु के मन में भय उत्पन्न होता था। कौरव सेना ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन इस भयंकर ध्वनि से किया।

यह श्लोक कौरव पक्ष के शंखनाद का वर्णन करता है। अगले श्लोक में पाण्डव पक्ष से कृष्ण और अर्जुन का शंखनाद होगा, जो इससे भी अधिक प्रभावशाली वर्णित किया गया है।

दोनों पक्षों के शंखनाद की तुलना — कौरव पक्ष का "तुमुल" शब्द और पाण्डव पक्ष का आगे आने वाला वर्णन — गीता की काव्य-शैली का सुन्दर उदाहरण है।

अध्याय 1 · 13 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 13 / 47 अगला →