📿 श्लोक संग्रह

अयनेषु च सर्वेषु

गीता 1.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥
अयनेषु
मोर्चों पर
सर्वेषु
सभी
यथाभागम्
अपने-अपने स्थान पर
अवस्थिताः
खड़े रहकर
भीष्मम्
भीष्म पितामह की
एव
ही
अभिरक्षन्तु
रक्षा करें
भवन्तः
आप सब
सर्वे
सभी
हि
निश्चय ही

दुर्योधन अपने सेनापतियों को आदेश देता है — "आप सभी अपने-अपने मोर्चों पर अपने निर्धारित स्थानों पर खड़े रहें और सबसे महत्वपूर्ण बात — भीष्म पितामह की चारों ओर से रक्षा करें।"

दुर्योधन जानता था कि भीष्म पितामह कौरव सेना की रीढ़ हैं। जब तक भीष्म खड़े हैं, कौरव सेना अजेय है। इसलिए वह सबको यह आदेश देता है कि भीष्म की सुरक्षा सबसे पहले है। यह एक अच्छी सैन्य रणनीति है — अपने सबसे शक्तिशाली योद्धा की रक्षा करना।

लेकिन इसमें एक विडम्बना भी है। भीष्म स्वयं इतने शक्तिशाली थे कि उन्हें किसी की रक्षा की आवश्यकता नहीं थी। दुर्योधन का यह आदेश उसकी अपनी असुरक्षा को ही दर्शाता है — वह डरता है कि कहीं पाण्डव भीष्म को पहले न गिरा दें।

यह दुर्योधन का अन्तिम वचन है इस प्रसंग में। उसने पहले पाण्डव योद्धाओं की सूची गिनाई, फिर कौरव योद्धाओं की, और अब वह भीष्म की रक्षा का आदेश देता है। इसके तुरन्त बाद भीष्म पितामह शंख बजाकर युद्ध का संकेत देते हैं।

महाभारत में भीष्म दस दिनों तक कौरव सेना के सेनापति रहे। उनके गिरने के बाद ही कौरव सेना का पतन शुरू हुआ — दुर्योधन की चिन्ता सही थी।

अध्याय 1 · 11 / 47
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