📚 पंचतंत्र

लकड़हारा और बंदर

6+ ~4 मिनट विष्णु शर्मा के पंचतंत्र से
📖 विष्णु शर्मा — पंचतंत्र

एक जंगल में बड़े-बड़े पेड़ थे। एक दिन वहाँ कुछ लकड़हारे लकड़ी काटने आए। वे एक मोटे पेड़ को बीच से चीर रहे थे। काम आधा हुआ था। उन्होंने बीच में एक लकड़ी की कील ठोंक दी। फिर खाना खाने चले गए।

उसी जंगल में एक बंदर रहता था। वह बड़ा शरारती था। जब लकड़हारे चले गए, वह उस पेड़ के पास आया। पेड़ में फँसी कील उसे बड़ी अजीब लगी।

'यह क्या है?' उसने सोचा। उसे बड़ी उत्सुकता हुई। उसने पेड़ पर चढ़कर उस कील को देखा। फिर उसने उसे खींचना शुरू किया।

जैसे ही कील निकली, पेड़ के दो हिस्से वापस आपस में मिल गए। बंदर का एक पैर उनके बीच में था। पैर बुरी तरह फँस गया।

बंदर चिल्लाया। वह तड़पा। पर पेड़ ने उसका पैर नहीं छोड़ा। लकड़हारे दूर थे। कोई सुनने वाला नहीं था।

जब लकड़हारे लौटे, तब उन्होंने बंदर को छुड़ाया। बंदर का पैर बुरी तरह दर्द कर रहा था।

जो काम हमारा नहीं, उसमें हाथ डालना ठीक नहीं। बंदर ने बिना सोचे कील खींची — और खुद ही फँस गया।

पंचतंत्र · 8 / 15
💡 इस कहानी की सीख
दूसरे के काम में अनजाने हाथ डालना, खुद को मुसीबत में डालना है।
पंचतंत्र की यह कथा एक सरल सत्य सिखाती है — जो चीज़ हम समझते नहीं, उसे बिना सोचे छेड़ना नुकसानदेह होता है। बंदर की उत्सुकता ने उसे ही तकलीफ़ दी। जो काम जिसका नहीं, उसमें हाथ न डालो।
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