बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। उसके घर में एक छोटा-सा बच्चा था। उसी घर में एक नेवला भी पला था। वह नेवला घर का सच्चा साथी था।
एक दिन ब्राह्मण की पत्नी बाज़ार जाने लगी। उसने पति से कहा — 'बच्चे का ध्यान रखना।' ब्राह्मण भी थोड़ी देर में बाहर चला गया। बच्चा पालने में सो रहा था।
तभी एक काला साँप घर में घुस आया। वह पालने की ओर बढ़ने लगा। नेवले ने उसे देखा। उसने एक पल भी नहीं सोचा। उसने साँप पर झपट्टा मारा।
दोनों में घमासान हुआ। नेवला बहादुर था। उसने साँप को मार डाला। बच्चा सुरक्षित था। नेवले के मुँह और पंजों पर खून लग गया था।
वह दौड़ता हुआ दरवाज़े पर आया। तभी ब्राह्मण की पत्नी घर लौटी। उसने नेवले को देखा। उसके मुँह पर खून था। उसने एक पल भी नहीं सोचा।
उसने सोचा — 'इसने मेरे बच्चे को मार डाला!' उसने पानी का घड़ा नेवले पर दे मारा। नेवला वहीं मर गया।
वह भागी-भागी अंदर गई। बच्चा चैन से सो रहा था। पास में साँप मरा पड़ा था। वह समझ गई। उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसने जल्दबाज़ी में वफ़ादार नेवले को खो दिया था। कुछ भी करने से पहले एक पल रुकना ज़रूरी है। जल्दबाज़ी में जो हाथ उठता है, वह कभी-कभी अपनों को ही चोट देता है।