बहुत पुरानी बात है। एक ऋषि नदी के किनारे बैठे थे। तभी एक चील एक नन्हा-सा चूहा लेकर उड़ी। ऋषि ने अपनी शक्ति से चूहे को एक सुंदर बालिका में बदल दिया। उन्होंने उसे अपनी पुत्री की तरह पाला।
जब वह बड़ी हुई, तो ऋषि ने सोचा — 'अब इसके लिए सबसे अच्छा वर ढूँढना होगा।' उन्होंने सबसे पहले सूर्य देव को बुलाया। उनसे कहा — 'क्या आप इसके योग्य वर हैं?'
सूर्य बोले — 'मैं तो तेज़ से भरा हूँ। पर बादल मुझे ढक लेता है — वह मुझसे भी बड़ा है।' ऋषि ने बादल को बुलाया।
बादल बोला — 'मैं तो सब ढकता हूँ। पर हवा मुझे उड़ा देती है — वह मुझसे बड़ी है।' ऋषि ने हवा को बुलाया।
हवा बोली — 'मैं तो सब उड़ाती हूँ। पर पर्वत मेरे सामने नहीं हिलता — वह मुझसे बड़ा है।' ऋषि ने पर्वत को बुलाया।
पर्वत बोला — 'मैं तो अटल हूँ। पर चूहा मुझे भी खोद डालता है — वह मुझसे बड़ा है।'
ऋषि ने बालिका से पूछा। बालिका ने चूहे को देखा। उसका मन प्रसन्न हो गया। ऋषि ने उसे फिर से चूहिया बना दिया। दोनों साथ चले गए।
जो जिसके स्वभाव में है, वह उसी में सुखी रहता है। बाहरी रूप बदलने से अंदर का स्वभाव नहीं बदलता।