📚 पंचतंत्र

बातूनी कछुआ

6+ ~4 मिनट विष्णु शर्मा के पंचतंत्र से
📖 विष्णु शर्मा — पंचतंत्र

एक तालाब में एक कछुआ रहता था। उसके दो पक्के दोस्त थे — दो हंस। तीनों बड़े मेल से रहते थे।

एक साल उस इलाके में सूखा पड़ा। तालाब का पानी सूखने लगा। हंसों ने कहा — 'हम दूसरी जगह जाएँगे। पर तुम्हारा क्या होगा?' कछुआ बोला — 'मुझे भी साथ ले चलो।'

हंसों ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक लंबी लकड़ी की डाल ली। दोनों हंस उसके दोनों सिरे पकड़ेंगे। कछुआ बीच में मुँह से डाल को पकड़ेगा। बस, एक शर्त थी — 'चाहे कुछ भी हो, मुँह मत खोलना।'

कछुए ने हाँ कहा। तीनों उड़ चले। नीचे खेत थे। किसान थे। बच्चे थे। सब ऊपर देख रहे थे।

बच्चों ने ज़ोर से कहा — 'अरे देखो! हंस कछुए को ले जा रहे हैं!' फिर कोई बोला — 'कितना मूर्ख कछुआ है!'

कछुए से रहा न गया। उसने चिल्लाना चाहा — 'मूर्ख कौन है?' जैसे ही उसने मुँह खोला, वह सीधे नीचे गिर पड़ा।

हंस देखते रह गए। वे कुछ न कर सके। एक पल की बेसब्री ने सब कुछ छीन लिया।

पंचतंत्र · 11 / 15
💡 इस कहानी की सीख
कभी-कभी चुप रहना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।
पंचतंत्र का यह कछुआ बताता है कि बोलने की आदत हमेशा फ़ायदेमंद नहीं होती। जब किसी ने शर्त तय कर दी हो, और हम जानते भी हों कि चुप रहना ज़रूरी है — तब भी अगर ज़बान नहीं रुकती, तो नुकसान खुद उठाना पड़ता है। संयम ही कभी-कभी रक्षा करता है।
पंचतंत्र · 11 / 15 अगली →