भागवत पुराण में वर्णित है — कंस को पता चल गया था कि उसका काल गोकुल में है। वह चैन से नहीं बैठ सका। उसने पूतना नाम की एक राक्षसी को बुलाया। पूतना बड़ी चालाक थी। वह अपना रूप बदल सकती थी।
पूतना ने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया। वह गोकुल के गाँवों में घूमने लगी। उसके स्तनों में विष मिला हुआ था। वह छोटे बच्चों को अपना दूध पिलाती और उनकी जान ले लेती।
एक दिन पूतना नंद बाबा के घर पहुँची। यशोदा माँ ने उसे देखा। वह सुंदर और मीठे बोल वाली थी। यशोदा माँ को संदेह नहीं हुआ। पूतना शिशु कृष्ण को उठाकर दूध पिलाने लगी।
भागवत पुराण के अनुसार शिशु कृष्ण ने पूतना का विष पिया ही नहीं। उन्होंने पूतना के प्राण खींच लिए। पूतना तड़पी। उसका असली विशाल रूप सामने आ गया। वह धरती पर गिर पड़ी।
पूतना के गिरने की आवाज़ से सारा गोकुल काँप गया। यशोदा माँ दौड़ी आईं। उन्होंने देखा — शिशु कृष्ण उस विशाल राक्षसी की छाती पर खेल रहे थे। माँ ने उन्हें उठाया और सीने से लगा लिया।
गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। सब बड़ी राक्षसी का शव देखकर हैरान थे। पर वह छोटा-सा शिशु बिल्कुल सही-सलामत था। खिलखिला रहा था।
भागवत पुराण कहता है कि इस घटना ने सबको यह समझा दिया कि यह कोई साधारण बच्चा नहीं है। गोकुल के बुज़ुर्गों ने उस दिन कृष्ण की रक्षा के लिए मंत्र पढ़े। यशोदा माँ ने उन्हें अपनी आँखों से दूर न जाने दिया।