बहुत समय पहले की बात है। गोकुल में कृष्ण थोड़े बड़े हो गए थे। चलना-फिरना सीख लिया था। और सीख लिया था — माखन चुराना।
भागवत पुराण के अनुसार कृष्ण अपने सखाओं के साथ गाँव की गोपियों के घर जाते। वहाँ ऊँचे मटकों में माखन रखा होता था। कृष्ण और उनके साथी एक के ऊपर एक चढ़ जाते। मटका तोड़ देते। माखन खाते और सखाओं को भी खिलाते।
गोपियाँ परेशान हो गईं। वे यशोदा माँ के पास पहुँचीं। बोलीं — 'मैया, तेरे कन्हैया ने आज भी हमारा माखन खा लिया!' यशोदा माँ सुनकर मुस्कुरातीं। फिर कृष्ण को ढूँढने जातीं।
एक दिन यशोदा माँ ने कृष्ण को माखन खाते हुए पकड़ लिया। उन्होंने डाँटा — 'कन्हैया! तूने माखन क्यों खाया?' कृष्ण ने कहा — 'माँ, मैंने नहीं खाया।' उनके होठों पर माखन लगा था।
यशोदा माँ ने उन्हें पकड़ लिया। रस्सी उठाई। कृष्ण को ओखली से बाँधने लगीं। पर अजब बात हुई — रस्सी हमेशा दो अंगुल छोटी पड़ जाती। कितनी भी रस्सी जोड़ो, दो अंगुल कम। यशोदा माँ हँसती जातीं, रस्सी जोड़ती जातीं।
भागवत पुराण में वर्णित है — जब कृष्ण ने माँ को थकते देखा, तो उन्होंने रुकने दिया। माँ ने रस्सी बाँधी। पर उसी समय कृष्ण ने मुँह खोला। माँ ने देखा — उनके मुख के भीतर सारा ब्रह्मांड था। आकाश, नदियाँ, पर्वत, तारे — सब कुछ।
यशोदा माँ की आँखें चौंधिया गईं। फिर उनकी आँखों पर जैसे माया का परदा पड़ गया। वे भूल गईं कि उन्होंने क्या देखा। उन्हें फिर बस अपना नन्हा कन्हैया दिखा — होठों पर माखन लगाए, निर्दोष आँखों से माँ को देखता हुआ।
यशोदा माँ ने उन्हें गले से लगा लिया। गोपियाँ भी हँस पड़ीं। माखन की शिकायत कहीं पीछे छूट गई।