इस भाग में भगवान के अमूर्ति, योगीश, धनुर्धर, अनन्त, सविता, स्वस्तिद आदि नामों का वर्णन है। ये नाम उनकी निराकार-साकार दोनों प्रकृतियों, अवतार-लीलाओं और कल्याणकारी स्वभाव को दर्शाते हैं।
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
51
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ।
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ॥
न्यग्रोधः
वटवृक्ष-स्वरूप — सबको आश्रय देने वाले
उदुम्बरः
ऊपर आकाश रूप में व्याप्त
अश्वत्थः
पीपल-वृक्ष स्वरूप — संसार-वृक्ष
चाणूरान्ध्रनिषूदनः
चाणूर मल्ल का वध करने वाले
सहस्रार्चिः
सहस्र किरणों वाले
सप्तजिह्वः
अग्नि की सात जिह्वाओं वाले
सप्तैधाः
सात प्रकार के ईंधन (समिधा) वाले
सप्तवाहनः
सात अश्वों वाले — सूर्य-स्वरूप
भगवान वटवृक्ष की भाँति सबको आश्रय देते हैं, अश्वत्थ (पीपल) स्वरूप हैं। उन्होंने चाणूर मल्ल का वध किया। वे सहस्र किरणों और सात जिह्वाओं वाले अग्नि-सूर्य-स्वरूप हैं।
52
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ॥
अमूर्तिः
निराकार
अनघः
पापरहित
अचिन्त्यः
चिन्तन से परे
भयकृत्
दुष्टों में भय उत्पन्न करने वाले
भयनाशनः
भक्तों का भय नष्ट करने वाले
अणुः
सूक्ष्म से भी सूक्ष्म
बृहत्
विशाल से भी विशाल
कृशः
सूक्ष्म — तन्तु सदृश
स्थूलः
विराट — स्थूल रूप
गुणभृत्
गुणों को धारण करने वाले
निर्गुणः
गुणातीत
महान्
सबसे महान
भगवान निराकार, पापरहित और चिन्तन से परे हैं। वे दुष्टों में भय और भक्तों में अभय उत्पन्न करते हैं। वे अणु से भी सूक्ष्म, विराट से भी विशाल, गुणधारी और गुणातीत दोनों हैं।
53
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ॥
अधृतः
जिन्हें कोई धारण नहीं करता — स्वयं-स्थित
स्वधृतः
स्वयं को स्वयं धारण करने वाले
स्वास्यः
सुन्दर मुख वाले
प्राग्वंशः
प्राचीन वंश — सबसे पुरातन
वंशवर्धनः
वंश (सृष्टि) को बढ़ाने वाले
भारभृत्
विश्व का भार वहन करने वाले
कथितः
वेदों में वर्णित
योगी
योग-स्वरूप
योगीशः
योगियों के ईश्वर
सर्वकामदः
सब कामनाएँ पूरी करने वाले
भगवान को कोई नहीं धारता — वे स्वयं-स्थित हैं। वे प्राचीनतम वंश, सृष्टि-वर्धक, विश्व का भार वहन करने वाले, योगियों के ईश्वर और सब कामनाएँ पूरी करने वाले हैं।
54
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ॥
आश्रमः
सबके विश्राम-स्थल
श्रमणः
तपस्वी — परिश्रमी
क्षामः
संसार का क्षय करने वाले
सुपर्णः
सुन्दर पंखों वाले — गरुड़ पर विराजमान
वायुवाहनः
वायु को चलाने वाले
धनुर्धरः
धनुष धारण करने वाले — श्रीराम
धनुर्वेदः
धनुर्विद्या के ज्ञाता
दण्डः
दण्ड-स्वरूप — न्याय
दमयिता
दमन करने वाले
दमः
इन्द्रिय-संयम स्वरूप
भगवान सबके विश्राम-स्थल, तपस्वी और वायु के चालक हैं। वे धनुर्धर राम, धनुर्विद्या-ज्ञाता, न्याय-स्वरूप दण्ड और इन्द्रिय-संयम के मूर्तरूप हैं।
55
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमोऽयमः ।
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ॥
अपराजितः
कभी पराजित न होने वाले
सर्वसहः
सब कुछ सहन करने वाले
नियन्ता
सबके नियामक
नियमः
नियम-स्वरूप
अयमः
यम (मृत्यु) से रहित
सत्त्ववान्
सत्त्वगुण-सम्पन्न
सात्त्विकः
सात्त्विक स्वभाव वाले
सत्यः
सत्य-स्वरूप
सत्यधर्मपरायणः
सत्य और धर्म में सदा स्थित
भगवान अपराजेय, सर्वसहिष्णु, सबके नियामक और मृत्युरहित हैं। वे सत्त्वगुणी, सत्य-स्वरूप और सत्य-धर्म में सदा स्थित रहने वाले हैं।
56
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ।
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ॥
अभिप्रायः
सबके अभिप्राय (लक्ष्य)
प्रियार्हः
प्रिय-पूजा के योग्य
अर्हः
पूजनीय
प्रियकृत्
भक्तों का प्रिय करने वाले
प्रीतिवर्धनः
प्रेम बढ़ाने वाले
विहायसगतिः
आकाश में गति वाले — पक्षी रूप गरुड़ पर
ज्योतिः
प्रकाश-स्वरूप
सुरुचिः
सुन्दर रुचि वाले — दीप्तिमान
हुतभुक्
यज्ञ-आहुति का भोग करने वाले
विभुः
सर्वव्यापक
भगवान सबके लक्ष्य, पूजनीय, भक्तों का हित करने वाले और प्रेम बढ़ाने वाले हैं। वे आकाश-गामी, प्रकाश-स्वरूप, यज्ञ-भोक्ता और सर्वव्यापक हैं।
57
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ॥
रविः
सूर्य-स्वरूप
विरोचनः
विविध प्रकार से प्रकाशित करने वाले
सूर्यः
सबको प्रेरित करने वाले — सविता
सविता
सबके उत्पत्तिकर्ता
रविलोचनः
सूर्य ही जिनके नेत्र हैं
अनन्तः
सीमारहित — अनन्त
हुतभुक्
आहुति-भोक्ता
भोक्ता
सबका भोग करने वाले
सुखदः
सुख देने वाले
नैकजः
अनेक बार जन्म लेने वाले — अवतारी
अग्रजः
सबसे पहले जन्मे — आदि
भगवान सूर्य-स्वरूप, सबको प्रकाशित और प्रेरित करने वाले हैं। सूर्य उनके नेत्र हैं। वे अनन्त, सुखदायी, अनेक अवतार लेने वाले और सबसे पहले प्रकट हुए हैं।
58
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ।
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ॥
अनिर्विण्णः
कभी निराश न होने वाले
सदामर्षी
सदा सहनशील
लोकाधिष्ठानम्
सब लोकों का आधार
अद्भुतः
अद्भुत — आश्चर्यजनक
सनात्
सनातन — प्राचीन
सनातनतमः
सबसे प्राचीन — सनातनों में भी सनातन
कपिलः
कपिल मुनि रूप — सांख्य-प्रवर्तक
कपिः
सूर्य-स्वरूप — या वानर-रूप
अव्ययः
अविनाशी
भगवान कभी निराश नहीं होते, सदा सहनशील हैं और सब लोकों का आधार हैं। वे अद्भुत, सनातनों में भी सबसे प्राचीन, कपिल मुनि रूप और अविनाशी हैं।
59
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ।
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ॥
स्वस्तिदः
कल्याण देने वाले
स्वस्तिकृत्
कल्याण करने वाले
स्वस्ति
कल्याण-स्वरूप
स्वस्तिभुक्
कल्याण का भोग करने वाले
स्वस्तिदक्षिणः
कल्याण की दक्षिणा देने वाले
अरौद्रः
क्रूरता-रहित — सौम्य
कुण्डली
कुण्डल धारण करने वाले
चक्री
सुदर्शन चक्र धारी
विक्रमी
पराक्रमी
ऊर्जितशासनः
शक्तिशाली शासन करने वाले
भगवान कल्याणदाता, कल्याणकर्ता और स्वयं कल्याण-स्वरूप हैं। वे सौम्य, कुण्डलधारी, सुदर्शन-चक्रधारी, पराक्रमी और शक्तिशाली शासक हैं।
60
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ॥
शब्दातिगः
शब्दों (वाणी) से परे
शब्दसहः
वेदवाणी से वर्णित होने वाले
शिशिरः
शीतल — शान्ति देने वाले
शर्वरीकरः
रात्रि (प्रलय) करने वाले
अक्रूरः
क्रूरता-रहित — दयालु
पेशलः
कोमल — मृदु स्वभाव
दक्षः
कुशल — समर्थ
दक्षिणः
उदार — दक्षिणा देने वाले
क्षमिणां वरः
क्षमाशीलों में श्रेष्ठ
भगवान शब्दों से परे हैं पर वेदवाणी उनका वर्णन करती है। वे शीतल, दयालु, कोमल, कुशल, उदार और क्षमाशीलों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
संदर्भ
विष्णु सहस्रनाम · 6 / 11