📿 विष्णु सहस्रनाम

श्लोक 61–70

विष्णु सहस्रनाम · 7 / 11
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व — विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
61
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ॥
विद्वत्तमः
विद्वानों में श्रेष्ठ
वीतभयः
भय से रहित
पुण्यश्रवणकीर्तनः
जिनका श्रवण और कीर्तन पुण्यकारी है
उत्तारणः
संसार-सागर से उद्धार करने वाले
दुष्कृतिहा
पापों का नाश करने वाले
पुण्यः
परम पुण्यमय
दुःस्वप्ननाशनः
बुरे स्वप्नों का नाश करने वाले
भगवान विद्वानों में श्रेष्ठ और भयरहित हैं। उनका श्रवण-कीर्तन पुण्यकारी है। वे संसार से उद्धार करते हैं, पापों का नाश करते हैं और बुरे स्वप्नों को दूर करते हैं।
62
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ।
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ॥
वीरहा
वीर शत्रुओं का नाश करने वाले
रक्षणः
रक्षा करने वाले
सन्तः
सज्जन-स्वरूप
जीवनः
जीवन-दायक — प्राण-स्वरूप
पर्यवस्थितः
सब ओर स्थित — सर्वव्यापी
अनन्तरूपः
अनन्त रूपों वाले
अनन्तश्रीः
अनन्त ऐश्वर्य वाले
जितमन्युः
क्रोध पर विजय प्राप्त करने वाले
भयापहः
भय को दूर करने वाले
भगवान शत्रुओं का नाश करने वाले, रक्षक, जीवनदायक और सर्वव्यापी हैं। उनके रूप और ऐश्वर्य अनन्त हैं। वे क्रोध पर विजयी और भक्तों के भय को हरने वाले हैं।
63
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ॥
चतुरश्रः
सब ओर से सम — न्यायी
गभीरात्मा
गम्भीर आत्मा वाले
विदिशः
सब दिशाओं को ज्ञान देने वाले
व्यादिशः
विविध आदेश देने वाले
दिशः
दिशाओं के स्वामी
अनादिः
जिनका आदि नहीं
भूः
पृथ्वी-स्वरूप
भुवः
अन्तरिक्ष-स्वरूप
लक्ष्मीः
सम्पत्ति-स्वरूप — शोभा
सुवीरः
श्रेष्ठ वीर
रुचिराङ्गदः
सुन्दर बाजूबन्द धारण करने वाले
भगवान सब ओर से न्यायी, गम्भीर आत्मा वाले और दिशाओं के स्वामी हैं। वे अनादि, पृथ्वी-अन्तरिक्ष-स्वरूप, सम्पत्ति-रूप, श्रेष्ठ वीर और सुन्दर आभूषणों से शोभित हैं।
64
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ।
आधारनिलयो धाता पुष्पहासः प्रजागरः ॥
जननः
सबको जन्म देने वाले
जनजन्मादिः
सब जीवों के जन्म के आदि कारण
भीमः
भय उत्पन्न करने वाले — विकराल
भीमपराक्रमः
भयंकर पराक्रम वाले
आधारनिलयः
सब आधारों का निवास
धाता
सबको धारण करने वाले
पुष्पहासः
पुष्प की भाँति प्रफुल्लित — मुस्कराते हुए
प्रजागरः
सदा जागृत
भगवान सब जीवों के जन्मदाता, आदि कारण और भयंकर पराक्रमी हैं। वे सब आधारों के आश्रय, धारणकर्ता, पुष्प-सी मुस्कान वाले और सदा जागृत हैं।
65
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ॥
ऊर्ध्वगः
ऊपर जाने वाले — ऊर्ध्वगामी
सत्पथाचारः
सत्य मार्ग पर चलने वाले
प्राणदः
प्राण देने वाले
प्रणवः
ॐकार-स्वरूप
पणः
व्यवहार का आधार — कर्मफल-दाता
प्रमाणम्
प्रमाण-स्वरूप — ज्ञान का आधार
प्राणनिलयः
प्राणों का निवास
प्राणभृत्
प्राणों को धारण करने वाले
प्राणजीवनः
प्राणों का जीवन — प्राणों के प्राण
भगवान ऊर्ध्वगामी, सत्पथ के आचारी, प्राणदाता और ॐकार-स्वरूप हैं। वे प्रमाण-स्वरूप, प्राणों का निवास, प्राणों के धारक और प्राणों के भी प्राण हैं।
66
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ।
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सवित प्रपितामहः ॥
तत्त्वम्
परम तत्त्व — सत्य
तत्त्ववित्
तत्त्व को जानने वाले
एकात्मा
एक ही आत्मा — अद्वितीय
जन्ममृत्युजरातिगः
जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे से परे
भूर्भुवःस्वस्तरुः
भू-भुवः-स्वः तीनों लोकों के वृक्ष
तारः
संसार से तारने वाले
सविता
सबके उत्पत्तिकर्ता
प्रपितामहः
ब्रह्मा के भी पितामह — सबके प्रपितामह
भगवान परम तत्त्व, तत्त्वज्ञ और अद्वितीय आत्मा हैं। वे जन्म-मृत्यु-जरा से परे, तीनों लोकों के वृक्ष, संसार से तारने वाले और सबके प्रपितामह हैं।
67
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ।
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः ॥
यज्ञः
यज्ञ-स्वरूप
यज्ञपतिः
यज्ञ के स्वामी
यज्वा
यज्ञ करने वाले
यज्ञाङ्गः
यज्ञ जिनके अंग हैं
यज्ञवाहनः
यज्ञ को चलाने वाले
यज्ञभृत्
यज्ञ को धारण करने वाले
यज्ञकृत्
यज्ञ को उत्पन्न करने वाले
यज्ञी
यज्ञ-स्वामी
यज्ञभुक्
यज्ञ का भोग करने वाले
यज्ञसाधनः
यज्ञ का साधन
इस श्लोक में भगवान को दस यज्ञ-सम्बन्धी नामों से पुकारा गया है। वे यज्ञ स्वयं हैं, यज्ञ के स्वामी, कर्ता, अंग, वाहक, धारक, भोक्ता और साधन — सब कुछ भगवान ही हैं।
68
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ॥
यज्ञान्तकृत्
यज्ञ का फल देने वाले
यज्ञगुह्यम्
यज्ञ का रहस्य
अन्नम्
अन्न-स्वरूप — भोग्य
अन्नादः
अन्न का भोग करने वाले
आत्मयोनिः
स्वयं अपने कारण — स्वयम्भू
स्वयंजातः
स्वयं प्रकट होने वाले
वैखानः
पृथ्वी को खोदकर निकालने वाले — वराह अवतार
सामगायनः
सामवेद का गायन करने वाले
भगवान यज्ञ का फल देने वाले, यज्ञ का रहस्य, अन्न और अन्न-भोक्ता दोनों हैं। वे स्वयम्भू, वराह अवतार में पृथ्वी उठाने वाले और सामवेद के गायक हैं।
69
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।
शंखभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥
देवकीनन्दनः
देवकी के आनन्द — श्रीकृष्ण
स्रष्टा
सृष्टि के रचयिता
क्षितीशः
पृथ्वी के ईश्वर
पापनाशनः
पापों का नाश करने वाले
शंखभृत्
पाञ्चजन्य शंख धारण करने वाले
नन्दकी
नन्दक तलवार धारी
चक्री
सुदर्शन चक्र धारी
शार्ङ्गधन्वा
शार्ङ्ग धनुष धारी
गदाधरः
कौमोदकी गदा धारण करने वाले
भगवान देवकी-नन्दन श्रीकृष्ण, सृष्टिकर्ता, पृथ्वीपति और पापनाशक हैं। वे पाँच आयुध — शंख, नन्दक खड्ग, सुदर्शन चक्र, शार्ङ्ग धनुष और कौमोदकी गदा — धारण करते हैं।
70
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।।
रथाङ्गपाणिः
चक्र (रथ का अंग) हाथ में धारण करने वाले
अक्षोभ्यः
जिन्हें विचलित न किया जा सके
सर्वप्रहरणायुधः
सब प्रकार के शस्त्र-अस्त्र जिनके आयुध हैं
भगवान चक्रधारी, अविचल और सब प्रकार के शस्त्र-अस्त्रों से सुसज्जित हैं। इस अन्तिम नाम 'सर्वप्रहरणायुधः' को दोहराकर विष्णु सहस्रनाम की नाम-माला पूर्ण होती है।

इस भाग में भगवान के पुण्यश्रवणकीर्तन, तत्त्व, प्रणव (ॐकार), यज्ञ-स्वरूप, देवकीनन्दन और सर्वप्रहरणायुध आदि नामों का वर्णन है। ये नाम उनकी पापनाशक शक्ति, यज्ञ-स्वरूपता, अवतार-लीला और सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाते हैं।

विष्णु सहस्रनाम · 7 / 11
विष्णु सहस्रनाम · 7 / 11 अगला →