सातवें अनुवाक में यज्ञ के समस्त उपकरणों — समिधा, वेदी, स्रुचा, ग्रावा, सोम, हवि — की प्रार्थना है। यज्ञ वैदिक जीवन का केन्द्र है और रुद्र से यज्ञ-सामग्री माँगना परम भक्ति है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
इध्मश्च मे बर्हिश्च मे वेदिश्च मे ।
इध्मः
समिधा (यज्ञ की लकड़ी)
बर्हिः
कुश (यज्ञ का आसन)
वेदिः
यज्ञ-वेदी
मुझे समिधा, कुश और यज्ञ-वेदी मिले — अर्थात् यज्ञ सम्पन्न करने के सब साधन उपलब्ध हों।
मन्त्र 2
धिष्ण्याश्च मे स्रुचश्च मे चमसाश्च मे ।
धिष्ण्याः
यज्ञ के अग्निस्थान
स्रुचः
हवन की चम्मच
चमसाः
सोमपान के पात्र
मुझे यज्ञ के अग्निस्थान, हवन की चम्मच और सोमपान के पात्र मिलें।
मन्त्र 3
ग्रावाणश्च मे स्वरवश्च मे उपरवाश्च मे ।
ग्रावाणः
सोम कूटने के पत्थर
स्वरवः
ऊपर के पत्थर
उपरवाः
नीचे के पत्थर
मुझे सोम कूटने के पत्थर — ऊपर और नीचे दोनों — मिलें।
मन्त्र 4
आश्वभ्यश्च मे वाजायश्च मे सोमाय च मे ।
आश्वभ्यः
अश्वमेध के लिए
वाजाय
अन्न (बल) के लिए
सोमाय
सोम के लिए
अश्वमेध, अन्न प्राप्ति और सोमयाग — ये सब मुझे प्राप्त हों।
मन्त्र 5
शुक्रं च मे हविश्च मे धूपश्च मे ।
शुक्रम्
शुद्ध (सोमरस)
हविः
हवन सामग्री
धूपः
धूप (सुगन्धित धुआँ)
मुझे शुद्ध सोमरस, हवन सामग्री और धूप मिले।
मन्त्र 6
आज्यं च मे अन्नं च मे प्रतिष्ठा च मे ।
आज्यम्
घी (हवन का)
अन्नम्
अन्न
प्रतिष्ठा
प्रतिष्ठा (स्थिरता)
मुझे हवन का घी, अन्न और प्रतिष्ठा (स्थिरता) मिले।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 18 / 22