पाँचवें अनुवाक में विषम संख्याओं (1, 3, 5, 7 ... 33) की गणना है। ये यज्ञ की इष्टकाओं (ईंटों) की संख्या और वैदिक गणित का प्रतीक हैं। विषम संख्याएँ वैदिक परम्परा में शुभ मानी जाती हैं।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
एका च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे सप्त च मे ।
एका
एक
तिस्रः
तीन
पञ्च
पाँच
सप्त
सात
एक, तीन, पाँच, सात — ये विषम संख्याएँ मुझे मिलें (यज्ञ में इष्टकाओं की संख्या)।
मन्त्र 2
नव च म एकादश च मे त्रयोदश च मे ।
नव
नौ
एकादश
ग्यारह
त्रयोदश
तेरह
नौ, ग्यारह, तेरह — ये विषम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 3
पञ्चदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे ।
पञ्चदश
पन्द्रह
सप्तदश
सत्रह
नवदश
उन्नीस
पन्द्रह, सत्रह, उन्नीस — ये विषम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 4
एकविंशतिश्च मे त्रयोविंशतिश्च मे ।
एकविंशतिः
इक्कीस
त्रयोविंशतिः
तेईस
इक्कीस और तेईस — ये विषम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 5
पञ्चविंशतिश्च मे सप्तविंशतिश्च मे नवविंशतिश्च मे ।
पञ्चविंशतिः
पच्चीस
सप्तविंशतिः
सत्ताईस
नवविंशतिः
उनतीस
पच्चीस, सत्ताईस, उनतीस — ये विषम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 6
एकत्रिंशच्च मे त्रयस्त्रिंशच्च मे ।
एकत्रिंशत्
इकतीस
त्रयस्त्रिंशत्
तैंतीस
इकतीस और तैंतीस — ये विषम संख्याएँ मुझे मिलें। ये संख्याएँ यज्ञ में प्रयुक्त इष्टकाओं और देवताओं की संख्या का प्रतीक हैं।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 16 / 22