छठे अनुवाक में सम संख्याओं (4, 8, 12 ... 48) की गणना है। पिछले अनुवाक की विषम संख्याओं के साथ मिलकर ये पूर्ण यज्ञ-विधान को दर्शाती हैं।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
चतस्रश्च मे अष्टौ च मे द्वादश च मे ।
चतस्रः
चार
अष्टौ
आठ
द्वादश
बारह
चार, आठ, बारह — ये सम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 2
षोडश च मे विंशतिश्च मे चतुर्विंशतिश्च मे ।
षोडश
सोलह
विंशतिः
बीस
चतुर्विंशतिः
चौबीस
सोलह, बीस, चौबीस — ये सम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 3
अष्टाविंशतिश्च मे द्वात्रिंशच्च मे ।
अष्टाविंशतिः
अट्ठाईस
द्वात्रिंशत्
बत्तीस
अट्ठाईस और बत्तीस — ये सम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 4
षट्त्रिंशच्च मे चत्वारिंशच्च मे ।
षट्त्रिंशत्
छत्तीस
चत्वारिंशत्
चालीस
छत्तीस और चालीस — ये सम संख्याएँ मुझे मिलें।
मन्त्र 5
चतुश्चत्वारिंशच्च मेऽष्टाचत्वारिंशच्च मे ।
चतुश्चत्वारिंशत्
चवालीस
अष्टाचत्वारिंशत्
अड़तालीस
चवालीस और अड़तालीस — ये सम संख्याएँ मुझे मिलें। ये यज्ञ-वेदी की इष्टकाओं से सम्बन्धित हैं।
मन्त्र 6
वाजश्च प्रसवश्चापिजश्च क्रतुश्च सुवश्च मूर्धा च ।
वाजः
अन्न
प्रसवः
प्रेरणा
अपिजः
मित्रता
क्रतुः
यज्ञ
सुवः
स्वर्ग
मूर्धा
शीर्ष (सर्वोच्च)
अन्न, प्रेरणा, मित्रता, यज्ञ, स्वर्ग और सर्वोच्चता — ये सब मुझे मिलें।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 17 / 22