चतुर्थ अनुवाक में ऋत, सत्य, श्रद्धा, तेज और पौष्टिक पदार्थों की प्रार्थना है। वैदिक कर्मकाण्ड में अग्नि को सब कुछ अर्पित करने की भावना यहाँ व्यक्त है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
ऋतं च मे सत्यं च मे इष्टं च मे पूर्तं च मे ।
ऋतम्
ऋत (सत्य, व्यवस्था)
सत्यम्
सत्य
इष्टम्
यज्ञ-फल
पूर्तम्
दान-फल
मुझे ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था), सत्य, यज्ञ का फल और दान का फल मिले।
मन्त्र 2
श्रद्धा च मे सुवर्चसं च मे ।
श्रद्धा
श्रद्धा (विश्वास)
सुवर्चसम्
उत्तम तेज
मुझे श्रद्धा और उत्तम तेज मिले।
मन्त्र 3
पयश्च मे रसश्च मे घृतं च मे मधु च मे ।
पयः
दूध
रसः
रस
घृतम्
घी
मधु
मधु
मुझे दूध, रस, घी और मधु — ये सब पौष्टिक पदार्थ मिलें।
मन्त्र 4
सगधिश्च मे सपीतिश्च मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च मे ।
सगधिः
सुगन्ध
सपीतिः
सहभोजन
कृषिः
खेती
वृष्टिः
वर्षा
मुझे सुगन्ध, सहभोजन का सुख, उत्तम खेती और समय पर वर्षा मिले।
मन्त्र 5
जैत्रं च म औद्भिद्यं च मे रयिश्च मे पुष्टं च मे ।
जैत्रम्
विजय
औद्भिद्यम्
उत्पादन
रयिः
धन
पुष्टम्
पुष्टि
मुझे विजय, उत्पादन, धन और पुष्टि मिले।
मन्त्र 6
ऊर्जस्वती च मे पयस्वती चाग्ने सर्वहुतमसि ।
ऊर्जस्वती
ऊर्जा से भरपूर
पयस्वती
दूध से भरपूर
अग्ने
हे अग्नि
सर्वहुतम्
सब कुछ अर्पित
ऊर्जा और दूध से भरपूर — हे अग्नि, आपको सब कुछ अर्पित है।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 15 / 22