ग्यारहवाँ अनुवाक नमकम् का समापन है। इसमें प्रसिद्ध महामृत्युञ्जय मन्त्र (त्र्यम्बकम् यजामहे) है। रुद्र को सर्वव्यापक, औषधिपति और भगवान कहकर अन्तिम प्रार्थना की गई है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
त्र्यम्बकम्
तीन नेत्रों वाले को
यजामहे
पूजन करते हैं
सुगन्धिम्
सुगन्धित (दिव्य गुणों वाले)
पुष्टिवर्धनम्
पोषण बढ़ाने वाले
उर्वारुकम् इव
ककड़ी की तरह
मृत्योः मुक्षीय
मृत्यु से मुक्त हों
मा अमृतात्
अमृत से वंचित न हों
हम तीन नेत्रों वाले, दिव्य सुगन्ध से युक्त और पोषण बढ़ाने वाले शिव का पूजन करते हैं। जैसे पका हुआ फल डंठल से स्वयं अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु से मुक्त हों, परन्तु अमृत (मोक्ष) से वंचित न हों। यह प्रसिद्ध महामृत्युञ्जय मन्त्र है।
मन्त्र 2
यो रुद्रो अग्नौ यो अप्सु य ओषधीषु ।
यो रुद्रो विश्वा भुवनाऽऽविवेश तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥
अग्नौ
अग्नि में
अप्सु
जल में
ओषधीषु
औषधियों में
विश्वा भुवना
समस्त लोकों में
आविवेश
प्रवेश कर गए हैं
जो रुद्र अग्नि में हैं, जल में हैं, औषधियों में हैं और जो समस्त लोकों में प्रविष्ट हैं — उन रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 3
तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य ।
स्तुहि
स्तुति करो
स्विषुः
उत्तम बाणों वाले
सुधन्वा
उत्तम धनुष वाले
भेषजस्य
औषधि के
क्षयति
स्वामी हैं
उत्तम बाणों और धनुष वाले, समस्त औषधियों के स्वामी रुद्र की स्तुति करो।
मन्त्र 4
या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाह भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥
शिवा तनूः
कल्याणकारी रूप
भेषजी
औषधिरूप
मृड
सुख दें
जीवसे
जीवन के लिए
हे रुद्र, आपका जो कल्याणकारी, सदा औषधिरूप शरीर है — उस कल्याणकारी औषधिरूप से हमें जीवन के लिए सुख प्रदान करें।
मन्त्र 5
इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्रभरामहे मतिम् ।
तवसे
बलशाली को
कपर्दिने
जटाधारी को
क्षयद्वीराय
वीरों के आश्रय को
मतिम्
बुद्धि, स्तुति
बलशाली, जटाधारी और वीरों के आश्रय रुद्र को हम अपनी स्तुति अर्पित करते हैं।
मन्त्र 6
नमो वो अस्तु भगवन्तो विश्वे देवा अवन्तु नः ।
भगवन्तः
भगवान (ऐश्वर्यवान)
विश्वे देवाः
समस्त देवता
अवन्तु
रक्षा करें
भगवान रुद्र और समस्त देवताओं को नमस्कार है — वे सब हमारी रक्षा करें।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 11 / 22