नौवें अनुवाक में रुद्र के परस्पर विरोधी रूपों — छोटे-बड़े, प्राचीन-नवीन, अग्र-प्रथम — में एक ही परमात्मा का दर्शन कराया गया है। यह अद्वैत दृष्टि का सुंदर उदाहरण है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
नमो मीढुष्टमाय चेषुमते च ।
मीढुष्टमाय
अत्यन्त वर्षा (कृपा) करने वाले को
इषुमते
बाणधारी को
अत्यन्त कृपा बरसाने वाले और बाणधारी रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 2
नमो ह्रस्वाय च वामनाय च ।
ह्रस्वाय
छोटे रूप वाले को
वामनाय
बौने रूप वाले को
छोटे और वामन (बौने) रूप में विद्यमान रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 3
नमो बृहते च वर्षीयसे च ।
बृहते
विशाल रूप वाले को
वर्षीयसे
सबसे बड़े को
विशाल और सबसे बड़े रूप वाले रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 4
नमो वृद्धाय च संवृद्ध्वने च ।
वृद्धाय
प्राचीन (वृद्ध) को
संवृद्ध्वने
सम्यक् बढ़ने वाले (नित्य वर्धमान) को
प्राचीन (वृद्ध) और नित्य वर्धमान रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 5
नमो अग्रियाय च प्रथमाय च ।
अग्रियाय
सबसे आगे रहने वाले को
प्रथमाय
सर्वप्रथम को
सबसे आगे और सर्वप्रथम रहने वाले रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 6
नम आशवे चाजिराय च ।
आशवे
सर्वव्यापक को
अजिराय
चपल (तीव्रगामी) को
सर्वव्यापक और तीव्रगामी रुद्र को नमस्कार है।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 9 / 22