पाँचवें अनुवाक में रुद्र की सर्वव्यापकता का विस्तार है — वे बड़े-छोटे, रथी-पैदल, सेनापति-सैनिक, शिल्पकार-वनवासी सब में विद्यमान हैं। यह समाज के हर वर्ग में ईश्वर को देखने की वैदिक दृष्टि है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
नमो महद्भ्यः क्षुल्लकेभ्यश्च वो नमः ।
महद्भ्यः
बड़े (विशाल) रूपों को
क्षुल्लकेभ्यः
छोटे (सूक्ष्म) रूपों को
रुद्र के विशाल और सूक्ष्म दोनों रूपों को नमस्कार है।
मन्त्र 2
नमो रथिभ्योऽरथेभ्यश्च वो नमः ।
रथिभ्यः
रथ पर चलने वालों को
अरथेभ्यः
बिना रथ के चलने वालों को
रथ पर आरूढ़ और बिना रथ के विचरण करने वाले रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 3
नमः सेनाभ्यः सेनानिभ्यश्च वो नमः ।
सेनाभ्यः
सेनाओं को
सेनानिभ्यः
सेनापतियों को
रुद्र की सेनाओं को और उनके सेनापतियों को नमस्कार है।
मन्त्र 4
नमः क्षत्तृभ्यः संग्रहीतृभ्यश्च वो नमः ।
क्षत्तृभ्यः
द्वारपालों को
संग्रहीतृभ्यः
सारथियों (रथ चालकों) को
द्वारपालों को और सारथियों को नमस्कार है।
मन्त्र 5
नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमः ।
तक्षभ्यः
बढ़ई (काष्ठकारों) को
रथकारेभ्यः
रथ बनाने वालों को
बढ़ई और रथ बनाने वाले शिल्पकारों को नमस्कार है — जो रुद्र के ही रूप हैं।
मन्त्र 6
नमः कुलालेभ्यः कर्मारेभ्यश्च वो नमः ।
कुलालेभ्यः
कुम्हारों को
कर्मारेभ्यः
लोहारों को
कुम्हारों और लोहारों को नमस्कार है — रुद्र समस्त शिल्पकारों में विद्यमान हैं।
मन्त्र 7
नमः पुञ्जिष्टेभ्यो निषादेभ्यश्च वो नमः ।
पुञ्जिष्टेभ्यः
मछुआरों को
निषादेभ्यः
निषाद (वनवासी) जनों को
मछुआरों और वनवासी जनों को नमस्कार है — रुद्र सभी वर्गों के जनों में विराजमान हैं।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 5 / 22