द्वितीय अनुवाक में रुद्र के विभिन्न रूपों और स्वामित्वों का वर्णन है। वे दिशाओं, मार्गों, अन्न, पशुओं, क्षेत्रों और समस्त जगत के स्वामी हैं। यह अनुवाक रुद्र की सर्वव्यापकता को प्रकट करता है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
नमो हिरण्यबाहवे सेनान्ये दिशां च पतये नमः ।
हिरण्यबाहवे
सुवर्ण भुजाओं वाले को
सेनान्ये
सेनापति को
दिशां पतये
दिशाओं के स्वामी को
सुवर्ण भुजाओं वाले, सेनापति और समस्त दिशाओं के स्वामी रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 2
नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः पशूनां पतये नमः ।
वृक्षेभ्यः
वृक्ष रूप वाले को
हरिकेशेभ्यः
हरित केशों (पत्तियों) वाले को
पशूनां पतये
पशुओं के स्वामी (पशुपति) को
वृक्षरूप में विद्यमान, हरित पत्तियों वाले और पशुपति रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 3
नमः सस्पिञ्जराय त्विषीमते पथीनां पतये नमः ।
सस्पिञ्जराय
पीतवर्ण (पीले रंग) वाले को
त्विषीमते
तेजस्वी को
पथीनां पतये
मार्गों के स्वामी को
पीतवर्ण, तेजस्वी और समस्त मार्गों के स्वामी रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 4
नमो बभ्लुशाय विव्याधिनेऽन्नानां पतये नमः ।
बभ्लुशाय
भूरे वर्ण वाले को
विव्याधिने
विशेष रूप से भेदने वाले को
अन्नानां पतये
अन्न के स्वामी को
भूरे वर्ण वाले, शत्रुओं को भेदने वाले और अन्न के स्वामी रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 5
नमो हरिकेशायोपवीतिने पुष्टानां पतये नमः ।
हरिकेशाय
हरित केशों वाले को
उपवीतिने
यज्ञोपवीत धारण करने वाले को
पुष्टानां पतये
पुष्टि के स्वामी को
हरित केशों वाले, यज्ञोपवीत धारी और पुष्टि के स्वामी रुद्र को नमस्कार है।
मन्त्र 6
नमो भवस्य हेत्यै जगतां पतये नमः ।
भवस्य
भव (शिव) के
हेत्यै
अस्त्र को
जगतां पतये
जगत के स्वामी को
भव (शिव) के अस्त्र को नमस्कार है। समस्त जगत के स्वामी को नमस्कार है।
मन्त्र 7
नमो रुद्रायाततायिने क्षेत्राणां पतये नमः ।
रुद्राय
रुद्र को
आततायिने
धनुष ताने हुए को
क्षेत्राणां पतये
क्षेत्रों (भूमि) के स्वामी को
धनुष ताने हुए रुद्र को नमस्कार है। समस्त क्षेत्रों के स्वामी को नमस्कार है।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 2 / 22