नमकम् का प्रथम अनुवाक रुद्र के क्रोध को शान्त करने की प्रार्थना है। यहाँ भक्त रुद्र के अस्त्र-शस्त्र को कल्याणकारी बनाने और उनके सौम्य रूप के दर्शन की याचना करता है। रुद्र को प्रथम दिव्य वैद्य भी कहा गया है।
📖 यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता
मन्त्र 1
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नमः ।
नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः ॥
नमस्ते
आपको नमस्कार
रुद्र
हे रुद्र
मन्यवे
आपके क्रोध को
इषवे
आपके बाण को
धन्वने
आपके धनुष को
बाहुभ्याम्
आपकी दोनों भुजाओं को
हे रुद्र, आपके क्रोध को नमस्कार है। आपके बाण को भी नमस्कार है। आपके धनुष को नमस्कार है और आपकी दोनों भुजाओं को भी नमस्कार है।
मन्त्र 2
या त इषुः शिवतमा शिवं बभूव ते धनुः ।
शिवा शरव्या या तव तया नो रुद्र मृडय ॥
इषुः
बाण
शिवतमा
अत्यंत कल्याणकारी
धनुः
धनुष
शरव्या
तरकस (तूणीर)
मृडय
सुख प्रदान करें
हे रुद्र, आपका बाण अत्यंत कल्याणकारी हो जाए, आपका धनुष शिव (मंगलकारी) हो जाए। आपके तरकस भी शुभ हों — उन सबके द्वारा हमें सुख प्रदान करें।
मन्त्र 3
या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥
शिवा तनूः
कल्याणकारी रूप
अघोरा
भयंकर नहीं, सौम्य
अपापकाशिनी
पापरहित, पवित्र
गिरिशन्त
पर्वतवासी शिव
अभिचाकशीहि
कृपादृष्टि करें
हे रुद्र, आपका जो कल्याणकारी, सौम्य और पवित्र रूप है — हे गिरिवासी शिव, उसी शान्त रूप से हम पर कृपादृष्टि करें।
मन्त्र 4
यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे ।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥
इषुम्
बाण को
गिरिशन्त
पर्वतवासी
हस्ते
हाथ में
बिभर्षि
धारण करते हैं
मा हिंसीः
हिंसा मत करें
पुरुषं जगत्
मनुष्यों और जगत को
हे गिरिवासी शिव, आप जो बाण हाथ में धारण करते हैं, उसे कल्याणकारी कर दें। मनुष्यों और समस्त जगत की हिंसा मत करें।
मन्त्र 5
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि ।
यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्मं सुमना असत् ॥
शिवेन वचसा
मंगलकारी वाणी से
गिरिश
पर्वतवासी शिव
वदामसि
प्रार्थना करते हैं
अयक्ष्मम्
रोगरहित
सुमनाः
प्रसन्नचित्त
हे गिरिवासी शिव, हम मंगलकारी वाणी से आपकी प्रार्थना करते हैं — जिससे हमारा समस्त जगत रोगरहित और प्रसन्नचित्त हो जाए।
मन्त्र 6
अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक् ।
अहींश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यः ॥
अधिवक्ता
रक्षक, हितैषी
प्रथमः
सर्वप्रथम
दैव्यः भिषक्
दिव्य वैद्य
अहीन्
सर्पों को
जम्भयन्
नष्ट करते हुए
यातुधान्यः
राक्षसियों को
वे रुद्र सबके रक्षक और सर्वप्रथम दिव्य वैद्य हैं। वे सर्पों और समस्त राक्षसी शक्तियों का नाश करते हैं।
मन्त्र 7
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः ।
ये चेमां रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशोऽवैषां हेड ईमहे ॥
ताम्रः
ताम्रवर्ण (लाल)
अरुणः
अरुण (उषाकालीन) वर्ण
बभ्रुः
भूरे वर्ण वाले
सुमङ्गलः
अत्यंत मंगलकारी
सहस्रशः
सहस्रों की संख्या में
हेडः ईमहे
क्रोध को शान्त करें
वे रुद्र जो ताम्रवर्ण, अरुणवर्ण और भूरे वर्ण वाले हैं तथा अत्यंत मंगलकारी हैं — और जो सहस्रों रुद्र सब दिशाओं में विराजमान हैं — उन सबके क्रोध को हम शान्त करें।
संदर्भ
श्री रुद्रम् · 1 / 22