📿 दुर्गा सप्तशती

पञ्चम अध्याय — देवी-दूत संवाद

दुर्गा सप्तशती · 5 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
देव्युवाच ।
ब्रूहि दूत महादैत्यः कोऽयं शुम्भो निशुम्भश्च ।
किमर्थं देवदेशे ऽस्मिन् युयुत्सुर्जातवेगवान् ॥
देव्युवाच
देवी ने कहा
दूत
हे दूत
महादैत्यः
महादैत्य
शुम्भः निशुम्भः
शुम्भ और निशुम्भ
किमर्थम्
किस उद्देश्य से
युयुत्सुः
युद्ध की इच्छा रखने वाला
देवी ने दूत से पूछा — हे दूत, यह शुम्भ और निशुम्भ कौन हैं? किस उद्देश्य से वे यहाँ आए हैं?
श्लोक 2
दूत उवाच ।
शुम्भो ऽसुरेन्द्रो बलवान् महाबलः ।
त्वाम् इच्छति महाभागे स्वभार्यात्वेन भामिनि ॥
दूत उवाच
दूत ने कहा
शुम्भः असुरेन्द्रः
असुरों के राजा शुम्भ
बलवान् महाबलः
अत्यंत बलशाली
त्वाम् इच्छति
तुम्हें चाहते हैं
महाभागे भामिनि
हे भाग्यशाली, हे सुंदरी
दूत ने कहा — असुरराज शुम्भ अत्यंत बलशाली हैं और वे आपको अपनाना चाहते हैं।
श्लोक 3
देव्युवाच ।
सत्यमुक्तं त्वया नाऽत्र मिथ्या किञ्चिद् वचस्त्वया ।
शुम्भो बली निशुम्भश्च किं सत्यं तद् भवेन्मम ॥
सत्यमुक्तम्
सत्य कहा
मिथ्या न
असत्य नहीं
शुम्भः बली
शुम्भ बलशाली है
किं सत्यम्
किंतु यह भी सत्य है
भवेत् मम
मेरे लिए
देवी ने उत्तर दिया — तुमने सत्य कहा। शुम्भ बलशाली है। किंतु मैंने एक प्रतिज्ञा की है।
श्लोक 4
यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति ।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥
यः मां जयति
जो मुझे युद्ध में जीते
संग्रामे
युद्ध में
मे दर्पम् व्यपोहति
मेरा दर्प हरे
प्रतिबलः
मेरे समान बलशाली
मे भर्ता भविष्यति
वही मेरा स्वामी होगा
देवी ने प्रतिज्ञा सुनाई — जो मुझे संग्राम में जीते, जो मेरे समान बलशाली हो, वही मेरा स्वामी हो सकता है। शुम्भ पहले युद्ध में आए।
श्लोक 5
तच्छ्रुत्वा दूतवचनं क्रुद्धः शुम्भो महासुरः ।
प्रेषयामास धूम्रलोचनं दैत्यपुंगवम् ॥
तच्छ्रुत्वा
यह सुनकर
क्रुद्धः शुम्भः
क्रोधित शुम्भ
प्रेषयामास
भेजा
धूम्रलोचनम्
धूम्रलोचन को
दैत्यपुंगवम्
दैत्यों में श्रेष्ठ
यह उत्तर सुनकर शुम्भ क्रोधित हो गया। उसने धूम्रलोचन नामक दैत्य को देवी को पकड़ लाने भेजा।
श्लोक 6
देव्युवाच ।
एवमेतद् बलिष्ठो ऽसौ किं तु मां युद्धमाह्वय ।
तन्निवार्यमिदं कर्म तव दूत ममोत्तमम् ॥
बलिष्ठः असौ
वह बलशाली है
मां युद्धम् आह्वय
मुझे युद्ध के लिए बुलाओ
तन्निवार्यम्
यही उचित है
ममोत्तमम्
यह मेरा उत्तम वचन
देवी ने दूत को स्पष्ट कहा — शुम्भ बलशाली है तो वह युद्ध के लिए आए। यही मेरी शर्त है।
श्लोक 7
इत्युक्त्वा सा जगन्माता हास्यपूर्णमुखाम्बुजा ।
दूतो गत्वा तु शुम्भाय वचनं प्राह तद्वचः ॥
जगन्माता
जगत की माँ
हास्यपूर्णमुखाम्बुजा
मुस्कुराते कमलमुख वाली
दूतः गत्वा
दूत जाकर
शुम्भाय वचनम् प्राह
शुम्भ को यह वचन कहा
जगन्माता मुस्कुराती रहीं। दूत लौटकर शुम्भ को उनका उत्तर सुना गया।
श्लोक 8
तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः शुम्भः क्रोधमुपागमत् ।
न्यायतो न हि देव्येयं वशगा भविता मम ॥
देव्याः वचनम् श्रुत्वा
देवी का वचन सुनकर
क्रोधम् उपागमत्
क्रोध में आया
न्यायतः
युद्ध की शर्त से
वशगा न भविता
वश में नहीं आएगी
देवी का वचन सुनकर शुम्भ क्रोधित हो गया। वह समझ गया — देवी युद्ध के बिना नहीं आएंगी।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, पञ्चम अध्याय में देवी और शुम्भ के दूत के बीच संवाद है। शुम्भ ने देवी को अपनाना चाहा। देवी ने स्पष्ट कहा — जो मुझे युद्ध में जीत सके, वही मेरा स्वामी होगा।

यह संवाद देवी की निर्भयता और उनकी प्रतिज्ञा का परिचय देता है। शुम्भ देवी की शर्त मानने की बजाय धूम्रलोचन को भेजता है — जो अगले अध्याय में परास्त होता है।

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