📿 दुर्गा सप्तशती

तृतीय अध्याय — महिषासुर वध

दुर्गा सप्तशती · 3 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
ततः क्रुद्धो महिषासुरो गत्वा देवीसमीपतः ।
महिषीं रूपमास्थाय तां ययौ स मृत्युसन्निभः ॥
क्रुद्धः महिषासुरः
क्रोधित महिषासुर
देवीसमीपतः
देवी के पास
महिषीं रूपम् आस्थाय
भैंसे का रूप धारण कर
मृत्युसन्निभः
मृत्यु के समान
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, महिषासुर क्रोध में भैंसे का रूप धारण कर देवी की ओर बढ़ा।
श्लोक 2
देवी तु तस्य पाशेन बद्ध्वा तं महिषासुरम् ।
गर्जन्तं स्वपदाक्रान्तं खड्गेनाताडयत् तदा ॥
पाशेन बद्ध्वा
पाश से बाँधकर
गर्जन्तम्
गर्जना करते हुए
स्वपदाक्रान्तम्
अपने चरणों से दबाकर
खड्गेन आताडयत्
खड्ग से प्रहार किया
देवी ने महिषासुर को पाश से बाँधा, अपने चरणों से दबाया और खड्ग से उस पर प्रहार किया।
श्लोक 3
स तत्याज महिषं रूपं देव्याः शक्त्या प्रभाविताम् ।
अथ सिंहभवद्रूपं पुनश्चक्रे महासुरः ॥
महिषं रूपम् तत्याज
भैंसे का रूप छोड़ दिया
देव्याः शक्त्या प्रभाविताम्
देवी की शक्ति से प्रभावित होकर
सिंहभवद्रूपम्
सिंह का रूप
पुनः चक्रे
फिर धारण किया
देवी की शक्ति से प्रभावित होकर महिषासुर ने भैंसे का रूप छोड़ा और सिंह का रूप धारण किया — किंतु देवी का तेज अनंत था।
श्लोक 4
नानारूपाणि दत्त्वाऽसौ देव्या शक्त्यभिभूयत ।
तेनैव तु पुरुषस्तत्र देवीं संप्राप्य योत्स्यते ॥
नानारूपाणि दत्त्वा
अनेक रूप धारण करके
असौ
वह महिषासुर
देव्याः शक्त्या अभिभूयत
देवी की शक्ति से परास्त हुआ
पुरुषः
मनुष्य रूप
महिषासुर ने अनेक रूप धारण किए — भैंसा, सिंह, मनुष्य — पर देवी की शक्ति से वह परास्त होता रहा।
श्लोक 5
ततो देवी त्रिशूलेन जघान च महासुरम् ।
स पपात धरां तेन चाल्यमानो महाहवे ॥
त्रिशूलेन जघान
त्रिशूल से प्रहार किया
महासुरम्
महादैत्य को
पपात धराम्
धरती पर गिर पड़ा
महाहवे
इस महायुद्ध में
अंत में देवी ने त्रिशूल से प्रहार किया और महिषासुर धरती पर गिर पड़ा।
श्लोक 6
देवाः स्तोत्रैः स्तवनं चक्रुर्देव्याः प्रसन्नचेतसः ।
जयेति जयशब्दाश्च नभो ऽऽपूरयन् दिशः ॥
देवाः स्तोत्रैः
देवताओं ने स्तोत्र से
स्तवनं चक्रुः
स्तुति की
प्रसन्नचेतसः
प्रसन्न मन से
जयशब्दाः
जय-जयकार के शब्द
नभः आपूरयन्
आकाश में गूँज उठे
महिषासुर के पतन के बाद देवताओं ने प्रसन्न होकर देवी की जय-जयकार की। आकाश में उनकी स्तुति गूँज उठी।
श्लोक 7
सिंहनादो ऽभवत् तस्या देव्याः प्रचण्डनिस्स्वनः ।
तेन पूरयामास नभो महीं च सर्वदिशः ॥
सिंहनादः
सिंह के समान गर्जन
प्रचण्डनिःस्वनः
अत्यंत प्रचंड ध्वनि
पूरयामास
भर दिया
नभः महीम् सर्वदिशः
आकाश, पृथ्वी और सभी दिशाएँ
देवी का सिंहनाद आकाश, पृथ्वी और सभी दिशाओं में गूँज उठा। संसार में आनंद छा गया।
श्लोक 8
एतत् ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ।
एवंभूता देवी शत्रूनपि युद्धे निहन्ति वै ॥
एतत् कथितम्
यह कथा सुनाई
देवीमाहात्म्यम् उत्तमम्
देवी का उत्तम महात्म्य
एवंभूता देवी
ऐसी देवी
शत्रून् निहन्ति
शत्रुओं को परास्त करती हैं
ऋषि ने कहा — हे राजन, यही देवी का उत्तम महात्म्य है। ऐसी देवी भक्तों की सभी बाधाएँ दूर करती हैं।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, तृतीय अध्याय महिषासुर वध की पूर्ण कथा है। महिषासुर ने भैंसे, सिंह और मनुष्य — अनेक रूप धारण किए। पर देवी की शक्ति अपार थी। अंततः त्रिशूल के प्रहार से महिषासुर का पतन हुआ।

देवताओं ने प्रसन्न होकर जय-जयकार की। इसी विजय के उपलक्ष्य में देवी को महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है।

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