📿 दुर्गा सप्तशती

द्वितीय अध्याय — महिषासुर सैन्य वध

दुर्गा सप्तशती · 2 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
ॐ ऐं देव्यास्तु महिषासुरसैन्यनाशे वर्ण्यते ।
उत्पत्तिं च तदा देव्याः शृणु राजन् सुरद्विषाम् ॥
महिषासुरसैन्यनाशे
महिषासुर की सेना के विनाश प्रसंग में
उत्पत्तिम्
उत्पत्ति / प्रकटना
देव्याः
देवी का
सुरद्विषाम्
देवताओं के शत्रुओं की
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, ऋषि बताते हैं — हे राजन्, अब देवी के प्रकट होने की और महिषासुर की सेना के परास्त होने की कथा सुनो।
श्लोक 2
देवासुरमभूद् युद्धं पूर्णमेव शताब्दिकम् ।
महिषासुरनाथेन देवसेना पराजिता ॥
देवासुरम् युद्धम्
देवताओं और असुरों का युद्ध
शताब्दिकम्
सौ वर्षों तक
महिषासुरनाथेन
महिषासुर के नेतृत्व में
देवसेना पराजिता
देवताओं की सेना हार गई
देवताओं और असुरों का युद्ध सौ वर्षों तक चला। महिषासुर के नेतृत्व में असुरों की सेना ने देवताओं को पराजित कर दिया।
श्लोक 3
ततः कोपं चकारोच्चैः अम्बिका चण्डिका तदा ।
काली कराली च महाभयंकरा ॥
कोपम् चकार
क्रोध में आईं
अम्बिका चण्डिका
माँ अम्बिका, चण्डिका
काली
काली रूप
महाभयंकरा
अत्यंत प्रचंड
देवी अम्बिका — जो चण्डिका, काली — सभी देवताओं के तेज से प्रकट हुईं। उनका प्रचंड स्वरूप दिखा।
श्लोक 4
तस्याः तेजो समुद्भूतं देवानाम् परमाद्भुतम् ।
एकीभूतं समजज्वाल तदा ताराभिसंनिभम् ॥
तेजः समुद्भूतम्
तेज उत्पन्न हुआ
देवानाम्
सभी देवताओं का
एकीभूतम्
एक में मिलकर
समजज्वाल
प्रज्वलित हो उठा
ताराभिसंनिभम्
तारों के समान दीप्तिमान
सभी देवताओं का तेज एक में मिल गया और तारों के समान चमकने लगा। उसी तेज से देवी प्रकट हुईं।
श्लोक 5
शिवस्य च त्रिशूलाद् वज्रमिन्द्रस्य चाभवत् ।
देवेभ्यश्चायुधानि च समाजग्मुस्तदा बहून् ॥
शिवस्य त्रिशूलात्
शिव के त्रिशूल से
वज्रम् इन्द्रस्य
इन्द्र का वज्र
देवेभ्यः आयुधानि
देवताओं के अस्त्र-शस्त्र
समाजग्मुः
आ मिले
शिव ने त्रिशूल दिया, इन्द्र ने वज्र दिया। सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र देवी को अर्पित किए।
श्लोक 6
सा च सिंहवरारूढा चण्डिका व्याप्य गोचरम् ।
उवाच महासिंहनादं तेनाशेषा दिशो ध्वनिः ॥
सिंहवरारूढा
श्रेष्ठ सिंह पर आरूढ़
चण्डिका
देवी चण्डिका
महासिंहनादम्
प्रचंड सिंहनाद किया
अशेषाः दिशः
सभी दिशाएँ
ध्वनिः
गूँज उठीं
देवी सिंह पर सवार होकर प्रकट हुईं। उनके सिंहनाद से सभी दिशाएँ गूँज उठीं।
श्लोक 7
देव्या विनिहतास्ते ऽपि तदा सैन्यं महासुरम् ।
रथैर्गजैश्च तुरगैः पैदलैश्चावृतं महत् ॥
देव्या विनिहताः
देवी द्वारा परास्त
महासुरम् सैन्यम्
महादैत्यों की विशाल सेना
रथैः गजैः तुरगैः
रथों, हाथियों और घोड़ों से
पैदलैः
पैदल सैनिकों से
रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सेना से सुसज्जित महिषासुर की विशाल सेना को देवी ने परास्त किया।
श्लोक 8
ततः सा चण्डिका देवी शूलमुद्यम्य दारुणम् ।
महिषासुरसैन्येभ्यो वरमाह शुचिस्मिता ॥
चण्डिका देवी
देवी चण्डिका
शूलम् उद्यम्य
शूल उठाकर
दारुणम्
तीव्र, प्रचंड
शुचिस्मिता
निर्मल मुस्कान वाली
देवी चण्डिका ने शूल उठाया। उनकी मुस्कान निर्मल थी और शक्ति अपार — सेनापतियों को परास्त किया।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, द्वितीय अध्याय में महिषासुर की सेना के परास्त होने की कथा है। सभी देवताओं ने अपना तेज और अपने अस्त्र देवी को अर्पित किए। देवी सिंह पर सवार होकर प्रकट हुईं और अपने सिंहनाद से महिषासुर की विशाल सेना को परास्त किया।

यह अध्याय बताता है कि देवी शक्ति सभी देवताओं की सामूहिक शक्ति का स्वरूप है।

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