📿 दुर्गा सप्तशती

प्रथम अध्याय — मधु-कैटभ वध

दुर्गा सप्तशती · 1 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
ॐ नमश्चण्डिकायै ।
मार्कण्डेय उवाच ।
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यते ऽष्टमः ॥
नमश्चण्डिकायै
चण्डिका देवी को नमस्कार
मार्कण्डेय उवाच
मार्कंडेय ऋषि ने कहा
सावर्णिः
सावर्णि नाम के
सूर्यतनयः
सूर्य के पुत्र
अष्टमः मनुः
आठवें मनु
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, मार्कंडेय ऋषि ने कहा — सूर्य के पुत्र सावर्णि आठवें मनु कहलाते हैं। यहीं से देवी महात्म्य की कथा आरंभ होती है।
श्लोक 2
विप्रचित्तिश्च चण्डश्च शुम्भो निशुम्भ एव च ।
महिषश्चैव दुर्गा च नमुचिश्चण्ड एव च ॥
विप्रचित्तिः
विप्रचित्ति नामक दैत्य
शुम्भः निशुम्भः
शुम्भ और निशुम्भ — दो महादैत्य
महिषः
महिषासुर
नमुचिः
नमुचि नामक दैत्य
प्रथम अध्याय में उन दैत्यों का परिचय आता है जिन पर देवी ने विजय पाई। शुम्भ, निशुम्भ, महिषासुर आदि सभी का संक्षिप्त उल्लेख यहाँ है।
श्लोक 3
देव्याः प्रसादात् तत्सर्वं सावर्णेश्च मनोर्बलम् ।
मम संश्रुणु वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥
देव्याः प्रसादात्
देवी की कृपा से
सावर्णेः मनोः बलम्
सावर्णि मनु का पराक्रम
संश्रुणु
ध्यान से सुनो
यथावत्
जैसा हुआ, वैसा
अनुपूर्वशः
क्रम से
ऋषि कहते हैं — देवी की कृपा से सावर्णि मनु को जो बल मिला, वह कथा मैं क्रम से सुनाता हूँ। ध्यान से सुनो।
श्लोक 4
योगनिद्रां गतस्तस्य जघने भगवान् हरिः ।
तदा महासुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥
योगनिद्राम्
योगनिद्रा में
गतः भगवान् हरिः
विराजमान भगवान विष्णु
महासुरौ घोरौ
दो भयंकर महादैत्य
मधुकैटभौ
मधु और कैटभ नाम के
सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे। उसी समय मधु और कैटभ नाम के दो भयंकर दैत्य प्रकट हुए।
श्लोक 5
ब्रह्मणस्तु तदा जाग्रत् ज्ञानशक्तिः समागता ।
स्तोतुं प्रचक्रमे भक्त्या योगनिद्रामिश्वरीम् ॥
ब्रह्मणः
ब्रह्माजी ने
जाग्रत्
जागृत होकर
ज्ञानशक्तिः
ज्ञानशक्ति — देवी का एक रूप
स्तोतुम्
स्तुति करने को
योगनिद्राम् ईश्वरीम्
योगनिद्रा रूपिणी देवी की
ब्रह्माजी विचलित हो उठे। उन्होंने योगनिद्रा रूपिणी देवी की भक्तिपूर्वक स्तुति आरंभ की।
श्लोक 6
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥
त्वं स्वाहा
तुम ही स्वाहा हो — यज्ञ में आहुति की शक्ति
त्वं स्वधा
तुम ही स्वधा हो — पितरों को अर्पण
वषट्कारः
वेद का वषट् उच्चारण
सुधा
अमृत
अक्षरे नित्ये
अविनाशी, नित्य
त्रिधा मात्रात्मिका
ओम के तीन मात्राओं में विद्यमान
ब्रह्माजी स्तुति करते हैं — हे देवी, तुम ही स्वाहा हो, तुम ही स्वधा हो, तुम ही वेद की ध्वनि हो। तुम अमृत हो, नित्य हो, ओंकार की तीनों मात्राओं में तुम ही विद्यमान हो।
श्लोक 7
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
या देवी
जो देवी
सर्वभूतेषु
सभी प्राणियों में
विष्णुमाया इति शब्दिता
विष्णुमाया के नाम से पुकारी जाती है
नमस्तस्यै
उन्हें नमस्कार
नमो नमः
बारंबार नमन
जो देवी सभी प्राणियों में विष्णुमाया के रूप में विद्यमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 8
एवं स्तुता तदा देवी बोधयामास तं हरिम् ।
नेत्राभ्यां भ्रमरयुगम् त्यक्त्वा तुष्टाव तं हरिम् ॥
एवं स्तुता
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर
बोधयामास
जागृत कर दिया
नेत्राभ्यां भ्रमरयुगम् त्यक्त्वा
नेत्रों से भ्रमर के जोड़े का रूप छोड़कर
तुष्टाव
प्रसन्न हुईं
ब्रह्माजी की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने भगवान विष्णु को जागृत किया। विष्णु ने मधु और कैटभ का अंत किया।
श्लोक 9
अतिवीर्यौ महावीर्यौ तौ महासुरौ नृप ।
कृत्वा परिश्रमं युद्धे देवः पुनरुवाच ह ॥
अतिवीर्यौ
अत्यंत बलशाली
महावीर्यौ
महापराक्रमी
परिश्रमं युद्धे
युद्ध में परिश्रम करके
देवः
भगवान विष्णु
मधु और कैटभ अत्यंत बलशाली थे। उनके साथ बहुत देर युद्ध हुआ। विष्णु ने देवी की माया से उन्हें परास्त किया।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय मधु-कैटभ वध की कथा सुनाता है। सृष्टि के आरंभ में जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे, तब मधु और कैटभ नाम के दो महादैत्य प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने योगनिद्रा रूपिणी देवी की स्तुति की। देवी की कृपा से विष्णु जागे और उन्होंने दोनों दैत्यों का वध किया।

यह अध्याय देवी की शक्ति को समस्त सृष्टि का आधार बताता है — स्वाहा, स्वधा, सुधा, ओंकार — सब उन्हीं के रूप हैं।

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