📿 श्लोक संग्रह

न च मां तानि कर्माणि

गीता 9.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
न च
और नहीं
मां
मुझे
तानि कर्माणि
वे कर्म
निबध्नन्ति
बाँधते हैं
धनञ्जय
हे धनंजय, अर्जुन
उदासीनवत्
उदासीन की तरह
आसीनम्
बैठा हुआ
असक्तं
अनासक्त, आसक्ति-रहित
तेषु कर्मसु
उन कर्मों में

कृष्ण कहते हैं — यह सारी सृष्टि मैं करता हूँ, पर ये कर्म मुझे नहीं बाँधते। मैं उदासीन की तरह बैठा हूँ — आसक्ति नहीं, अहंकार नहीं।

यह वही स्थिति है जो कृष्ण अर्जुन को भी अपनाने के लिए कह रहे हैं — 'कर्म करो, पर फल में आसक्त मत हो।' कृष्ण स्वयं उस स्थिति में हैं। यह उपदेश नहीं, उनका स्वाभाविक स्वरूप है।

9.9 में कृष्ण का 'उदासीनवत्' शब्द महत्वपूर्ण है। वे उदासीन नहीं हैं — वे उदासीन की 'तरह' हैं। अर्थात् करते सब कुछ हैं, पर बंधते नहीं।

यही भाव अध्याय 3 (3.22-3.23) में भी कृष्ण ने अपने बारे में कहा था — 'मुझे कुछ पाना नहीं, फिर भी मैं कर्म करता हूँ।'

अध्याय 9 · 9 / 34
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