कृष्ण कहते हैं — यह सारी सृष्टि मैं करता हूँ, पर ये कर्म मुझे नहीं बाँधते। मैं उदासीन की तरह बैठा हूँ — आसक्ति नहीं, अहंकार नहीं।
यह वही स्थिति है जो कृष्ण अर्जुन को भी अपनाने के लिए कह रहे हैं — 'कर्म करो, पर फल में आसक्त मत हो।' कृष्ण स्वयं उस स्थिति में हैं। यह उपदेश नहीं, उनका स्वाभाविक स्वरूप है।