📿 श्लोक संग्रह

सर्वभूतानि कौन्तेय

गीता 9.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
सर्वभूतानि
सभी प्राणी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र, अर्जुन
प्रकृतिं
मूल प्रकृति में
यान्ति मामिकाम्
मेरी — में जाते हैं
कल्पक्षये
कल्प के अंत में
पुनः
फिर से
तानि
उन्हें
कल्पादौ
कल्प के आरंभ में
विसृजामि
प्रकट करता हूँ
अहम्
मैं

कृष्ण कहते हैं — कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं। और जब नया कल्प आता है, तो मैं उन्हें फिर से प्रकट करता हूँ। यह सृष्टि का अनंत चक्र है।

जैसे रात को सब सो जाते हैं और सुबह फिर जग जाते हैं — कल्प का यह क्रम उसी तरह का है, पर बहुत बड़े पैमाने पर। न कुछ नष्ट होता है, न कुछ नया बनता है — बस प्रकट होने और लीन होने का क्रम चलता है।

यह श्लोक 9.8 के साथ मिलकर सृष्टि-प्रलय के क्रम को समझाता है। 'कल्पक्षय' = महाप्रलय, और 'कल्पादौ' = नई सृष्टि का प्रारंभ।

भागवत पुराण और विष्णु पुराण में भी सृष्टि-प्रलय का यही चक्र वर्णित है — परमात्मा की प्रकृति में लीन और फिर प्रकट।

अध्याय 9 · 7 / 34
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