📿 श्लोक संग्रह

न च मत्स्थानि

गीता 9.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
न च
और नहीं भी
मत्स्थानि
मुझमें स्थित
भूतानि
प्राणी, जीव
पश्य
देखो
मे योगम् ऐश्वरम्
मेरा दिव्य योग
भूतभृत्
सभी को धारण करने वाला
न च भूतस्थः
फिर भी उनमें नहीं रहता
ममात्मा
मेरा आत्मा, मेरा स्वरूप
भूतभावनः
सबको उत्पन्न करने वाला

कृष्ण कहते हैं — यह मेरा दिव्य योग है। मैं सब प्राणियों को धारण करता हूँ, पर मैं उनमें बंधा नहीं हूँ। जैसे धरती सभी पेड़-पौधों को थामे रखती है, पर धरती खुद पेड़ नहीं बनती।

यह श्लोक 9.4 का विस्तार है। दोनों मिलकर परमात्मा के उस स्वभाव को दिखाते हैं जो सर्वत्र है, फिर भी किसी एक में बंधा नहीं। इसे कृष्ण 'ऐश्वर योग' — ईश्वर का विशेष योग — कहते हैं।

9.4 और 9.5 एक जोड़े की तरह हैं। 9.4 में 'व्याप्ति' है, 9.5 में उसकी व्याख्या। 'भूतभृत्' (धारण करना) और 'न च भूतस्थः' (फिर भी उनमें नहीं) — यह तनाव ही परमात्मा का लक्षण है।

श्वेताश्वतर उपनिषद् (4.1) में भी यही कहा गया है — वह एक देव सबमें छिपा है, सर्वव्यापी है, सभी प्राणियों का अंतरात्मा है।

अध्याय 9 · 5 / 34
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