📿 श्लोक संग्रह

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा

गीता 9.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
क्षिप्रम्
शीघ्र, जल्दी
भवति
हो जाता है
धर्मात्मा
धर्मात्मा — पुण्यात्मा
शश्वत् शान्तिम्
स्थायी शांति को
निगच्छति
प्राप्त करता है
कौन्तेय
हे कुंती-पुत्र
प्रतिजानीहि
घोषणा करो — जान लो
न मे भक्तः
मेरा भक्त नहीं
प्रणश्यति
नष्ट होता है

भगवान 9.30 की बात का परिणाम बताते हैं। वह दुराचारी जो अनन्य भक्ति का मार्ग चुनता है — वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है। भक्ति का बल उसे भीतर से बदल देता है।

फिर भगवान अर्जुन से कहते हैं — 'प्रतिजानीहि' — यह घोषणा कर दो — मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। यह गीता का एक अभय-वचन है — भगवान की प्रतिज्ञा।

यह श्लोक 9.30 का स्वाभाविक विस्तार है। वहाँ कहा — वह साधु है; यहाँ कहा — वह शांति पाता है और नष्ट नहीं होता। दोनों मिलकर भक्ति की पूर्ण आश्वासना देते हैं।

'न मे भक्तः प्रणश्यति' — यह वाक्य गीता के सबसे स्पष्ट अभयदान में से एक है। परंपरा में इसे भक्त के लिए भगवान की व्यक्तिगत प्रतिज्ञा माना जाता रहा है।

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