📿 श्लोक संग्रह

अपि चेत्सुदुराचारो

गीता 9.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
अपि चेत्
यदि भी
सुदुराचारः
अत्यंत दुराचारी
भजते
भजता है
माम्
मुझे
अनन्यभाक्
अनन्य भाव से — केवल मुझमें मन लगाकर
साधुः एव
साधु ही
सः मन्तव्यः
वह माना जाना चाहिए
सम्यग् व्यवसितः
सही निश्चय वाला — सुदृढ़ संकल्प वाला

यह गीता के सबसे साहसी और उदार वचनों में से एक है। भगवान कहते हैं — यदि कोई बहुत बुरे आचरण वाला भी हो, पर वह अनन्य भाव से मुझे भजता है — तो उसे साधु मानो।

क्यों? — क्योंकि उसने सही निश्चय किया। जिस क्षण कोई अनन्य भक्ति का मार्ग चुनता है — उसी क्षण से उसकी यात्रा बदल जाती है। पुराना आचरण धुलने लगता है।

यह श्लोक 9.29 की समता का व्यावहारिक रूप है। वहाँ कहा था कि भगवान सबमें समान हैं — यहाँ वह समता सबसे कठिन परीक्षण में खड़ी है।

परंपरा में इस श्लोक को 'भक्ति की सर्वोच्चता' का प्रमाण माना जाता रहा है। श्रीमद्भागवत में भी ऐसे उदाहरण हैं जहाँ भक्ति ने व्यक्ति के जीवन को पलट दिया।

अध्याय 9 · 30 / 34
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