📿 श्लोक संग्रह

अश्रद्दधानाः पुरुषाः

गीता 9.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
अश्रद्दधानाः
श्रद्धाहीन, विश्वास न रखने वाले
पुरुषाः
मनुष्य, जन
धर्मस्य अस्य
इस धर्म के
परन्तप
हे शत्रुओं को तपाने वाले, अर्जुन
अप्राप्य
न पाकर, बिना पाए
मां
मुझे
निवर्तन्ते
लौट जाते हैं
मृत्युसंसारवर्त्मनि
मृत्यु-जन्म के मार्ग पर

कृष्ण कहते हैं — जो इस ज्ञान पर श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे पाए बिना ही लौट जाते हैं। वे जन्म और मृत्यु के चक्र में बने रहते हैं।

श्रद्धा यहाँ आँखें मूँद कर मान लेने की बात नहीं है। श्रद्धा का अर्थ है — खुले मन से इस ज्ञान को परखने की तैयारी। बिना उस खुलेपन के, यह ज्ञान भी किसी काम नहीं आता।

यह श्लोक एक सावधानी की तरह है — 9.1 और 9.2 में कहा गया कि यह ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है, अब 9.3 में बताया जाता है कि इसे पाने की एकमात्र शर्त श्रद्धा है।

कठोपनिषद् में नचिकेता की यात्रा में भी यही बात है — यम भी उसी को परम रहस्य देते हैं जो श्रद्धा और धैर्य से माँगता है।

अध्याय 9 · 3 / 34
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