📿 श्लोक संग्रह

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं

गीता 9.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
ते
वे
भुक्त्वा
भोगकर
स्वर्गलोकम् विशालम्
विशाल स्वर्गलोक को
क्षीणे पुण्ये
पुण्य क्षीण होने पर
मर्त्यलोकम्
मृत्युलोक में
विशन्ति
प्रवेश करते हैं, लौटते हैं
त्रयीधर्मम्
तीन वेदों के धर्म को
अनुप्रपन्नाः
अनुसरण करने वाले
गतागतम्
आना-जाना
कामकामाः
भोगों की कामना रखने वाले
लभन्ते
पाते हैं

भगवान कहते हैं — जो स्वर्ग के सुख के लिए यज्ञ करते हैं, वे वहाँ जाकर खूब भोग करते हैं। पर जब उनका पुण्य समाप्त हो जाता है — तो वे फिर इसी पृथ्वी पर लौट आते हैं। 'गतागतम्' — यह आना-जाना बंद नहीं होता।

'कामकामाः' — जो भोगों की इच्छा लेकर पूजते हैं, वे इसी चक्र में रहते हैं। स्वर्ग एक पड़ाव है, गंतव्य नहीं। मुक्ति के लिए कामनाओं से ऊपर उठना होता है।

यह श्लोक 9.20 का परिणाम है — वहाँ स्वर्ग-प्राप्ति थी, यहाँ उसकी सीमा बताई गई है। भगवान वैदिक कर्मकांड को गलत नहीं कह रहे, पर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वह अंतिम मुक्ति नहीं है।

ब्रह्मसूत्र में कहा गया है — 'अनावृत्तिः शब्दात्' — जो एक बार मुक्त हो जाए, उसे लौटना नहीं पड़ता। यही 'गतागत' से परे की अवस्था है।

अध्याय 9 · 21 / 34
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