📿 श्लोक संग्रह

अवजानन्ति मां मूढाः

गीता 9.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
अवजानन्ति
तिरस्कार करते हैं, उपेक्षा करते हैं
मां
मुझे
मूढाः
अज्ञानी, भ्रमित लोग
मानुषीं तनुम्
मानव शरीर को
आश्रितम्
धारण किए हुए
परं भावम्
परम स्वरूप को
अजानन्तः
न जानते हुए
भूतमहेश्वरम्
सभी का परम ईश्वर

कृष्ण कहते हैं — जो मूढ़ हैं, वे मुझे केवल मनुष्य समझते हैं। वे मेरे भीतर के परम स्वरूप को नहीं जान पाते। जो दिखता है उसे ही सब कुछ मान लेते हैं।

यह बात हमारे जीवन में भी लागू होती है। अक्सर हम किसी बुज़ुर्ग, किसी बच्चे, किसी साधारण व्यक्ति को देखकर उसकी गहराई नहीं समझ पाते — बस बाहर देखते हैं। कृष्ण के मानव अवतार में यही विरोधाभास सबसे तीव्र है।

9.11 और 9.12 एक जोड़े के श्लोक हैं। 9.11 में अज्ञान की पहचान है, 9.12 में उसका परिणाम। दोनों मिलकर 'मोह' की एक तस्वीर बनाते हैं।

भागवत पुराण दशम स्कंध में भी कंस और अन्य जनों का यही हाल है — वे कृष्ण को बालक या सामान्य मनुष्य समझते रहे।

अध्याय 9 · 11 / 34
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