कृष्ण शेष प्रश्नों के उत्तर देते हैं। अधिभूत — अर्थात भौतिक संसार — वह सब कुछ है जो बदलता रहता है, नष्ट होता रहता है। अधिदैव — अर्थात दैवी शक्ति — वह विराट पुरुष है। और अधियज्ञ — अर्थात इस शरीर में जो यज्ञ का स्वामी है — वह स्वयं भगवान कृष्ण हैं।
यह बात बड़ी प्यारी है। कृष्ण कह रहे हैं कि तुम्हारे शरीर के भीतर जो हर अच्छे काम को प्रेरित करता है, हर यज्ञ-कर्म को चलाता है — वह मैं ही हूँ। जैसे घर में माँ हर काम की देखरेख करती है, वैसे ही भगवान हमारे भीतर बैठकर सब कुछ संभालते हैं।
इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि भगवान कहीं दूर नहीं बैठे — वे हर प्राणी के हृदय में विराजमान हैं।