कृष्ण कहते हैं — जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति (सर्वोच्च गंतव्य) कहते हैं। जिसे प्राप्त करके कोई लौटता नहीं — वह मेरा परम धाम है।
"तद्धाम परमं मम" — वह मेरा परम धाम है — यह बड़ी अद्भुत बात है। कृष्ण कह रहे हैं कि जो शाश्वत तत्त्व सृष्टि-प्रलय से परे है, वह कोई शून्य नहीं, वह मेरा घर है। जैसे हर व्यक्ति का एक घर होता है जहाँ वह लौटता है — वैसे ही भगवान का भी एक धाम है, और भक्त वहीं पहुँचता है।
और वहाँ से कोई नहीं लौटता — क्योंकि वहाँ कोई दुख नहीं, कोई कमी नहीं। जब सब कुछ मिल गया, तो लौटने की ज़रूरत ही क्या?