अध्याय के उपसंहार में कृष्ण कहते हैं — योगी तीनों से बढ़कर है। तपस्वी से — जो केवल शरीर कष्ट देते हैं। ज्ञानी से — जो केवल शास्त्र जानते हैं। कर्मकांडी से — जो केवल अनुष्ठान करते हैं। इसलिए — अर्जुन, योगी बनो।
यह 'बढ़कर' तुलनात्मक नहीं — पूरक है। तपस, ज्ञान, कर्म — सब योग के अंग हैं। जो इन सबको समेटकर जीता है — वही योगी है। इसीलिए वह सबसे पूर्ण है।