यह अर्जुन का बड़ा ईमानदार प्रश्न है। कृष्ण ने समत्वयोग का सुंदर वर्णन किया — पर अर्जुन कहता है, हे मधुसूदन, मन की चंचलता के कारण मुझे इस योग की कोई पक्की नींव नहीं दिखती। यानी — यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है, पर करना कैसे होगा?
यह प्रश्न हर साधक का है। ध्यान, समता, शांति — ये शब्द सुंदर हैं। पर जब बैठकर प्रयास करते हैं, मन भाग जाता है। अर्जुन वही बात कह रहा है जो हम सब अनुभव करते हैं।