📿 श्लोक संग्रह

यो मां पश्यति सर्वत्र

गीता 6.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
यः माम् पश्यति सर्वत्र
जो मुझे सब जगह देखता है
सर्वम् च मयि पश्यति
और सब को मुझमें देखता है
तस्य अहम् न प्रणश्यामि
उसके लिए मैं नहीं छुपता
स च मे न प्रणश्यति
और वह मेरे लिए नहीं छुपता

यह श्लोक कृष्ण का एक बहुत कोमल वचन है। जो मुझे हर जगह देखे — पानी में, आकाश में, माँ के प्रेम में, बच्चे की हँसी में — और सब कुछ मुझमें देखे — उस व्यक्ति को मैं कभी नहीं छोड़ता। और वह भी मुझसे दूर नहीं जाता।

यह द्विपक्षीय प्रेम है। एक ओर भक्त की दृष्टि — सब में कृष्ण। दूसरी ओर कृष्ण का वचन — ऐसे भक्त से मैं कभी छुपता नहीं। यह रिश्ता अटूट है।

6.30 और 6.31 मिलकर 'सर्वत्र दर्शन' के भक्तिपक्ष को दर्शाते हैं। 6.29 में ज्ञान-दृष्टि थी — सब में आत्मा देखना। 6.30 में भक्ति-दृष्टि आती है — सब में मुझे देखना।

9.4 में भी कृष्ण कहेंगे — 'मया ततमिदं सर्वम्' — मुझसे यह सब व्याप्त है। 6.30 उसी का पूर्वाभास है।

अध्याय 6 · 30 / 47
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