📿 श्लोक संग्रह

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगम्

गीता 6.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
तम् विद्यात्
उसे जानो
दुःखसंयोगवियोगम्
दुख के संयोग से वियोग
योगसञ्ज्ञितम्
योग नाम से जाना जाता है
स निश्चयेन
वह दृढ़ निश्चय से
योक्तव्यः
अभ्यास करना चाहिए
अनिर्विण्णचेतसा
बिना ऊबे, धैर्यपूर्ण मन से

यह श्लोक गीता की सबसे संक्षिप्त और सुंदर परिभाषाओं में से एक है। योग क्या है? दुख के संबंध से मुक्ति। जब मन दुख से जुड़ना बंद कर दे — वह योग है। इतनी सरल बात। और यह दृढ़ निश्चय से, बिना थके, बिना ऊबे करना है।

'अनिर्विण्णचेतसा' — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। योग का अभ्यास बार-बार टूटता है, मन भागता है — पर हार नहीं मानना। जैसे एक बच्चा साइकिल सीखता है — गिरता है, फिर उठता है। बिना निराश हुए प्रयास जारी रखना — यही 'अनिर्विण्ण' है।

यह 6.20–22 खंड का समापन श्लोक है। पहले योग का अनुभव बताया (6.20–22), अब योग की परिभाषा और उसका अभ्यास (6.23)। 'दुःखसंयोगवियोग' — यह गीता की एक अनूठी परिभाषा है।

परंपरा में इस श्लोक को विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि यह योग को नकारात्मक नहीं, बल्कि मुक्ति के रूप में परिभाषित करता है — दुख से वियोग, न कि सुख की खोज।

अध्याय 6 · 23 / 47
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