यह योग की परम प्राप्ति का लक्षण है। जो मिल गया — उससे बड़ा कोई लाभ इस संसार में नहीं। कोई धन नहीं, कोई यश नहीं, कोई सुख नहीं जो इस अवस्था से बढ़कर हो। और जब कोई इसमें स्थिर हो जाता है — तो बड़े से बड़ा दुख भी उसे नहीं हिला सकता।
यह दोनों लक्षण साथ आते हैं — न और कुछ चाहिए, और न कुछ डरा सकता है। एक ओर पूर्णता का बोध, दूसरी ओर अजेयता का अनुभव। यही योग की परम दशा है।