📿 श्लोक संग्रह

यं लब्ध्वा चापरं

गीता 6.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
यम् लब्ध्वा च
जिसे पाकर
अपरम् लाभम्
कोई और लाभ
न मन्यते अधिकम् ततः
उससे बड़ा नहीं मानता
यस्मिन् स्थितः
जिसमें स्थित रहने पर
दुःखेन गुरुणा अपि
बड़े भारी दुख से भी
न विचाल्यते
नहीं डिगता

यह योग की परम प्राप्ति का लक्षण है। जो मिल गया — उससे बड़ा कोई लाभ इस संसार में नहीं। कोई धन नहीं, कोई यश नहीं, कोई सुख नहीं जो इस अवस्था से बढ़कर हो। और जब कोई इसमें स्थिर हो जाता है — तो बड़े से बड़ा दुख भी उसे नहीं हिला सकता।

यह दोनों लक्षण साथ आते हैं — न और कुछ चाहिए, और न कुछ डरा सकता है। एक ओर पूर्णता का बोध, दूसरी ओर अजेयता का अनुभव। यही योग की परम दशा है।

6.20, 6.21 और 6.22 — तीनों मिलकर योग की उच्चतम अवस्था का वर्णन करते हैं। पहले आत्म-दर्शन, फिर परम सुख, अब परम प्राप्ति के दोनों लक्षण।

गीता के दूसरे अध्याय में 'स्थितप्रज्ञ' का वर्णन था — जो न दुख में घबराए, न सुख में उत्साहित हो। यह 6.22 उसी स्थितप्रज्ञ की परिणति है।

अध्याय 6 · 22 / 47
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