📿 श्लोक संग्रह

सुखमात्यन्तिकम्

गीता 6.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
सुखम् आत्यन्तिकम्
परम सुख, अनंत आनंद
यत् तत् बुद्धिग्राह्यम्
जो बुद्धि से अनुभव होता है
अतीन्द्रियम्
इन्द्रियों से परे
वेत्ति
जानता है, अनुभव करता है
यत्र न च एव अयम्
जहाँ यह व्यक्ति नहीं
स्थितः चलति तत्त्वतः
सत्य से डिगता है

कृष्ण उस सुख का वर्णन करते हैं जो योग की परम अवस्था में मिलता है। यह इन्द्रियों का सुख नहीं — मीठा खाना, सुंदर संगीत, शरीर का आराम — यह उससे कहीं ऊपर का है। यह बुद्धि से अनुभव होता है और इन्द्रियों की सीमा से परे है।

और इस सुख में जो स्थित हो जाता है, वह सत्य से नहीं हटता। जैसे एक गहरी नींद में सोया इंसान हल्की आवाज़ से नहीं जागता — उसी तरह इस सुख में स्थित योगी छोटी-बड़ी परिस्थितियों से नहीं डिगता।

यह 6.20 से जारी है। वहाँ आत्म-दर्शन का उल्लेख था — यहाँ उसके साथ जो सुख आता है उसका वर्णन है। 'अतीन्द्रियम्' — इन्द्रियों से परे — यह उपनिषद् की 'आनंद' की अवधारणा से मेल खाता है।

तैत्तिरीय उपनिषद् में आनंद को 'ब्रह्म' का स्वरूप कहा गया है — 'आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात्'। गीता का यह 'आत्यन्तिक सुख' उसी आनंद-ब्रह्म की ओर इशारा करता है।

अध्याय 6 · 21 / 47
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