📿 श्लोक संग्रह

अनाश्रितः कर्मफलम्

गीता 6.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
अनाश्रितः
आश्रय न लेते हुए
कर्मफलम्
कर्म का फल
कार्यम् कर्म
करने योग्य काम
करोति यः
जो करता है
स संन्यासी च योगी च
वह संन्यासी और योगी दोनों
न निरग्निः
न वह जो अग्नि छोड़े
न च अक्रियः
न वह जो कर्म छोड़े

भगवान कृष्ण यहाँ बहुत स्पष्ट बात कहते हैं — सच्चा संन्यासी वह नहीं जो घर-गृहस्थी छोड़ दे या अग्नि-होम बंद कर दे। सच्चा संन्यासी वह है जो अपना काम करता रहे, पर फल की चाह न रखे। कर्म करना जरूरी है — बस फल की चिंता छोड़नी है।

यह श्लोक उन लोगों के लिए बड़ी राहत की बात है जो सोचते हैं कि योग केवल गुफाओं में बैठने वालों के लिए है। कृष्ण कह रहे हैं — घर में रहो, काम करो, बस मन को फल से मत जोड़ो। यही असली योग है।

यह छठे अध्याय का पहला श्लोक है। यहाँ से भगवान ध्यानयोग और आत्म-संयम का उपदेश शुरू करते हैं। पाँचवें अध्याय में संन्यास और कर्मयोग की तुलना हुई थी — यहाँ उसका निष्कर्ष आता है।

गीता प्रेस संस्करण में इस अध्याय को 'आत्मसंयमयोग' कहा गया है। पहला ही श्लोक बताता है कि बाहरी त्याग से नहीं, भीतरी फल-त्याग से योग सिद्ध होता है।

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