📿 श्लोक संग्रह

यत्सांख्यैः प्राप्यते

गीता 5.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥
यत्
जो
सांख्यैः
सांख्य से
प्राप्यते
प्राप्त होता है
स्थानम्
स्थान, लक्ष्य
तत्
वही
योगैः
योग से
अपि
भी
गम्यते
प्राप्त होता है
एकम्
एक ही
सांख्यम्
सांख्य को
च योगम् च
और योग को
यः
जो
पश्यति
देखता है
सः पश्यति
वही सच में देखता है

कृष्ण बहुत सुंदर बात कहते हैं — सांख्य के मार्ग से जो मिलता है, वही योग के मार्ग से भी मिलता है। जो इन दोनों को एक ही देखता है — वह सच में समझदार है।

जैसे दो अलग-अलग गाँवों से आए दो लोग एक ही मेले में पहुँचते हैं — उनका रास्ता अलग था, पर मंज़िल एक थी। ऐसे ही ज्ञान और कर्म, दोनों उसी परमात्मा तक पहुँचाते हैं।

यह श्लोक पाँचवें अध्याय में ज्ञान और कर्म के मार्गों की एकता का सबसे स्पष्ट उद्घोष है। कृष्ण यहाँ किसी को भटका हुआ नहीं कहते — दोनों मान्य मार्ग हैं।

परंपरा में इस श्लोक को अद्वैत दृष्टि का प्रतीक माना जाता रहा है — मार्ग अनेक, लक्ष्य एक।

अध्याय 5 · 5 / 29
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