📿 श्लोक संग्रह

ये हि संस्पर्शजा भोगाः

गीता 5.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
ये हि
जो भी
संस्पर्शजाः
इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न
भोगाः
भोग, सुख
दुःखयोनयः
दुख के स्रोत
एव
ही
ते
वे
आद्यन्तवन्तः
आदि और अंत वाले, क्षणिक
कौन्तेय
हे कुंती के पुत्र (अर्जुन)
नहीं
तेषु
उनमें
रमते
रमता है
बुधः
ज्ञानी, विद्वान

कृष्ण कहते हैं — इंद्रियों के संपर्क से जो भोग मिलते हैं, वे दुख के ही स्रोत हैं। उनका आदि भी है, अंत भी। ज्ञानी उनमें नहीं रमता।

जैसे मिठाई खाने की इच्छा होती है, मिठाई मिली, खाई, मीठा लगा — पर थोड़ी देर में फिर भूख लगी। सुख क्षणिक था। जो जानता है यह, वह इस चक्र में नहीं फँसता।

यह श्लोक 5.21 के भीतरी आनंद का विपरीत पक्ष है। वहाँ बताया था कि भीतर का सुख अक्षय है — यहाँ बताया कि बाहरी सुख क्षणिक और दुखदायी हैं।

परंपरा में इस श्लोक को वैराग्य का आधार माना गया है — न विरक्ति का उपदेश, बल्कि यथार्थ का दर्शन।

अध्याय 5 · 22 / 29
अध्याय 5 · 22 / 29 अगला →