📿 श्लोक संग्रह

विद्याविनयसम्पन्ने

गीता 5.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
विद्याविनयसम्पन्ने
विद्या और विनय से युक्त
ब्राह्मणे
ब्राह्मण में
गवि
गाय में
हस्तिनि
हाथी में
शुनि
कुत्ते में
च एव
और
श्वपाके
चाण्डाल में
भी
पण्डिताः
ज्ञानी लोग
समदर्शिनः
समान दृष्टि से देखने वाले

इस श्लोक में बड़ी गहरी बात कही गई है। ज्ञानी व्यक्ति एक विद्वान ब्राह्मण में, एक गाय में, एक विशाल हाथी में, एक छोटे कुत्ते में और एक चाण्डाल (समाज में सबसे नीचे माने जाने वाले व्यक्ति) में — सबमें एक ही आत्मा देखता है।

बाहर से सब अलग-अलग दिखते हैं — कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई सम्मानित, कोई उपेक्षित। लेकिन भीतर सबमें वही एक आत्मा है। जैसे अलग-अलग बर्तनों में रखा पानी एक ही होता है — चाहे सोने के बर्तन में हो या मिट्टी के — वैसे ही अलग-अलग शरीरों में बसी आत्मा एक ही है।

यह श्लोक समानता की सबसे ऊँची शिक्षा है। जब कोई सचमुच सबमें एक ही आत्मा देखने लगे, तो फिर ऊँच-नीच, भेदभाव अपने-आप समाप्त हो जाते हैं।

यह श्लोक गीता के पाँचवें अध्याय कर्मसंन्यासयोग से है। इस अध्याय में कृष्ण कर्म और संन्यास दोनों मार्गों की तुलना करते हैं और बताते हैं कि सच्चा ज्ञानी वह है जो सब प्राणियों में समान दृष्टि रखता है।

परंपरा में इस श्लोक को ज्ञान की कसौटी माना जाता रहा है — जो सबमें समान आत्मा देखे, वही सच्चा पण्डित है।

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