📿 श्लोक संग्रह

बहूनि मे व्यतीतानि

गीता 4.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥
बहूनि
बहुत-से
मे
मेरे
व्यतीतानि
बीत चुके
जन्मानि
जन्म
तव
तुम्हारे भी
और
तानि
उन सबको
अहम्
मैं
वेद
जानता हूँ
सर्वाणि
सभी को
न त्वम्
तुम नहीं
वेत्थ
जानते

कृष्ण कहते हैं — हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे दोनों के बहुत सारे जन्म बीत चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, लेकिन तुम नहीं जानते। यह ऐसे है जैसे एक बुजुर्ग व्यक्ति अपने पूरे जीवन को याद रखता है, लेकिन उसका छोटा पोता अपने पिछले दिनों को भी याद नहीं रख पाता।

यहाँ कृष्ण और सामान्य आत्मा में एक बड़ा अंतर सामने आता है। सामान्य मनुष्य हर जन्म में नया होकर शुरू करता है — पिछला याद नहीं रहता। भगवान का स्मरण कभी नहीं जाता।

अर्जुन के प्रश्न (4.4) का यह पहला हिस्सा है। कृष्ण पहले बताते हैं कि दोनों के जन्म हुए हैं — फर्क केवल स्मरण का है।

अगला श्लोक (4.6) में कृष्ण बताते हैं कि वे अजन्मा होते हुए भी कैसे प्रकट होते हैं — यही उनके अवतार का रहस्य है।

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