जो यज्ञ के प्रसाद — यानी समर्पण के भाव से जीने का फल — ग्रहण करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। और जो बिल्कुल ही यज्ञभाव से नहीं जीता — जिसके जीवन में कोई त्याग, कोई समर्पण नहीं — उसके लिए यह लोक भी नहीं, परलोक की तो बात ही क्या।
यहाँ 'यज्ञ' केवल अग्निकुंड नहीं है। जो भी समर्पण और त्याग के भाव से जीता है — वही यज्ञी है। और जो केवल अपने लिए जीता है — वह अयज्ञी है।