📿 श्लोक संग्रह

अपरे नियताहाराः

गीता 4.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
अपरे
कुछ और
नियताहाराः
नियमित आहार वाले
प्राणान्
प्राणों को
प्राणेषु
प्राणों में
जुह्वति
अर्पित करते हैं
सर्वे अपि
ये सब भी
एते
ये
यज्ञविदः
यज्ञ के ज्ञाता
यज्ञक्षपितकल्मषाः
यज्ञ से पाप नष्ट किए हुए

यज्ञ-सूची का अंत यहाँ होता है। जो आहार को सीमित रखकर प्राणों को प्राणों में अर्पित करते हैं — वे भी एक यज्ञ ही करते हैं। इसके बाद कृष्ण कहते हैं — ये सब यज्ञ के ज्ञाता हैं और यज्ञ से उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।

यह श्लोक बड़ी समावेशी बात करता है — अलग-अलग तरीके से साधना करने वाले सभी 'यज्ञज्ञाता' हैं। कोई एक ही सच्चा मार्ग नहीं।

4.25 से शुरू हुई यज्ञ-प्रकारों की सूची यहाँ समाप्त होती है। छह श्लोकों में विभिन्न मार्गों को यज्ञ माना गया।

अगला श्लोक (4.31) यज्ञ-प्रसाद के महत्त्व की बात करता है — यज्ञ से बचा अमृत जो सनातन ब्रह्म तक पहुँचाता है।

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