यज्ञ-सूची का अंत यहाँ होता है। जो आहार को सीमित रखकर प्राणों को प्राणों में अर्पित करते हैं — वे भी एक यज्ञ ही करते हैं। इसके बाद कृष्ण कहते हैं — ये सब यज्ञ के ज्ञाता हैं और यज्ञ से उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।
यह श्लोक बड़ी समावेशी बात करता है — अलग-अलग तरीके से साधना करने वाले सभी 'यज्ञज्ञाता' हैं। कोई एक ही सच्चा मार्ग नहीं।