📿 श्लोक संग्रह

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये

गीता 4.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥
श्रोत्रादीनि
कान आदि
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
अन्ये
कुछ और
संयमाग्निषु
संयम की अग्नि में
जुह्वति
आहुति देते हैं
शब्दादीन्
शब्द आदि
विषयान्
विषयों को
इन्द्रियाग्निषु
इन्द्रियों की अग्नि में

यहाँ दो और प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं। एक — जो कान, आँख जैसी इन्द्रियों को संयम की अग्नि में डालते हैं यानी इन्द्रियों को रोककर साधना करते हैं। दूसरे — जो शब्द, रूप, स्पर्श जैसे विषयों को इन्द्रियों की अग्नि में अर्पित करते हैं यानी इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव को ही साधना बना लेते हैं।

दोनों रास्ते अलग-अलग हैं लेकिन दोनों में साधक यज्ञ की भावना से जीता है — संयम भी यज्ञ है, अनुभव भी यज्ञ है।

यह 4.25 से चली आ रही यज्ञ-सूची का दूसरा श्लोक है। कृष्ण विभिन्न साधना-मार्गों को 'यज्ञ' कहकर उनका सम्मान करते हैं।

अगला श्लोक (4.27) में प्राण और इन्द्रिय क्रियाओं को ज्ञान की अग्नि में अर्पित करने की बात आती है।

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