📿 श्लोक संग्रह

यदृच्छालाभसन्तुष्टो

गीता 4.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
यदृच्छालाभसन्तुष्टः
स्वयं आए लाभ से संतुष्ट
द्वन्द्वातीतः
द्वन्द्वों से परे
विमत्सरः
ईर्ष्यारहित
समः
समभाव वाला
सिद्धौ
सफलता में
असिद्धौ
असफलता में
और
कृत्वा
करके भी
अपि
होने पर भी
न निबध्यते
नहीं बँधता

जो बिना माँगे जो मिल जाए उसमें सन्तुष्ट है, सुख-दुख जैसे द्वन्द्वों से ऊपर है, किसी से ईर्ष्या नहीं करता, सफलता-असफलता में समान रहता है — वह कर्म करते हुए भी नहीं बँधता। यह वह अवस्था है जहाँ जीवन बोझ नहीं रहता।

जैसे पतंग आसमान में उड़ती है — हवा के साथ, हवा के विरुद्ध — लेकिन धागे से बँधी नहीं रहती जब धागा छूट जाए। इस श्लोक का मनुष्य ऐसे ही जीता है।

4.19 से 4.22 तक चार श्लोक मिलकर ज्ञानयोगी का पूरा चित्र बनाते हैं — इच्छारहित, तृप्त, समभावी, अनासक्त।

अगला श्लोक (4.23) इस सबका सार देता है — जो यज्ञभाव से कर्म करता है, उसके सब कर्म विलीन हो जाते हैं।

अध्याय 4 · 22 / 42
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